सन 2019 में जब पूरा विश्व कोविड नामक एक अज्ञात वायरस के भय से कांप रहा था, गौतम अडानी व्यापार समूह एक धूमकेतु की तरह चमक कर भारतीय व्यापारिक आकाश में उभरा। विश्व के पहले 7 सौ अति धनी लोगों में नीचे की पंक्ति से निकल कर मात्र तीन वर्ष में गौतम अडानी तीसरे स्थान पर आ गए। भारत में जो कुछ बेचा जा रहा था उसमें से ज्यादातर अडानी समूह खरीद रहा था जिसमें पोर्ट, एयरपोर्ट, हरित ऊर्जा, सीमेंट, मीडिया, खाद्य कंपनी आदि विविध क्षैत्रों के व्यापार थे। इस ताबड़तोड़ खरीददारी को लेकर कई लोगों ने सवाल उठाने प्रारंभ भी किए कि आखिर अडानी समूह के पास इतना धन यकायक कहां से आ गया। चूंकि ऐसे लोग अल्पमत में थे तो सामाजिक मीडिया की ट्रोल सेना ने इनकी आवाज को तकरीबन कुचल डाला।
व्यापार सिर्फ धर्म, देशप्रेम और जाति के नारों से नहीं चलता। ये सब राजनीतिक तिकड़मबाजी के सस्ते हथियार हैं। व्यापार में एक ही ताकत काम आती हैं जिसे रोकड़ा या कैश कहते हैं। गौतम अडानी के पास अपना रोकड़ा नहीं था और ना ही टीसीएस या इन्फोसिस जैसी कोई कंपनी थी जो हर रोज बैंक में पैसा डालती रहे। अडानी समूह के अधिकतर व्यापार पारदर्शिता से दूर रहते हैं। किन्ही विशेष कारणों से मीडिया उन पर कोई बातचीत नहीं करता और धन के स्त्रोत के बारे में कोई सवाल भी नहीं उठाता। उनकी कुछ कंपनियों का मूल्य और कमाई को गुणांक 800 को पार कर गया था पर किसी भी वित्तीय संस्थान ने सवाल नहीं उठाया कि भला इतना विस्मयकारी मुनाफा भविष्य में कौन से व्यापार में कमाया जा सकता है ?
अडानी समूह के अधिकतर व्यापार पारंपरिक व्यापार हैं जिनमें मुनाफे की दर एक सीमा से ज्यादा बढ़ ही नहीं सकती। ऐसी स्थिति में एक सवाल उठता है कि फिर उनके शेयर्स की कीमत इतनी अधिक कैसे रही? उत्तर समूह के शेयरधारकों के अनुपात से पता चलता है। इस समूह की किसी भी कंपनी में रिटेल निवेशकों का प्रतिशत दस के आंकड़े को नहीं छू पा रहा है। अडानी ग्रीन में तो रिटेल का हिस्सा मात्र 1.44 प्रतिशत है जबकि उच्चतम हिस्से वाली अडानी विल्मर और ए सी सी में 9.16 हिस्सा ही रिटेल निवेशकों का है। मात्र न डी टी वी जिसको अडानी ने अभी एक तरह से जबरदस्ती हथिया लिया था रिटेल का हिस्सा 18.03 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि अधिकतर शेयर्स समूह या उसके हित चिंतकों के पास हैं जिसके कारण उनका बाजार भाव आसानी से आवश्यकतानुसार ऊपर नीचे किए जा सकता है।
हिंडेनबर्ग नामक एक खोजी समूह है जो अमेरिका के बॉन्ड बाजार का भालू है। नाथन एंडरसन के नेतृत्व में कुछ लोग उन कंपनियों को निशाना बनाते है जो अपारदर्शी तरीके से व्यापार करती हैं और बॉन्ड्स जारी करके संस्थाओं से परोक्षरूप से जनधन पर आधिपत्य जमाती हैं। अडानी समूह ने पारदर्शिता को सदा से ही अंगूठा दिखाया और लोगों का अनुमान है कि कोई 2.5 लाख करोड़ का धन उधार लिया। अमेरिका के बॉन्ड बाजार में अडानी एक चर्चित नाम है इसलिए अपनी अपारदर्शिता के कारण हिंडेनबर्ग के लिए खुले में बैठी बत्तख। हिंडेनबर्ग गहरी छानबीन के लिए जाना जाता है और फिर खुले आम पारदर्शिता के साथ अडानी समूह जैसे लोगों के बॉन्ड को शॉर्ट सेल करके पैसा कमाता है। समूह पारदर्शिता के लिए जाना जाता है इसलिए अडानी समूह भारत के विरुद्ध षडयंत्र जैसे आरोप लगा कर बच नहीं सकता।
हिंडेनबर्ग की बात को सत्यापन तब मिल गया जब क्रेडिट सुइस की बैंकिंग अन्वेषण शाखा ने अडानी समूह के बॉन्ड्स की कीमत जीरो यानी जंक घोषित कर दी और इन दोनों कारणों से अडानी समूह की सारी कंपनियों की कीमत एक गिरते हुए खुले चाकू जैसी हो गई जिसे कोई पकड़ कर संभालने की हिम्मत नहीं कर सका। अडानी के साथ में वित्तमंत्री के बजट ने मिलकर भारतीय शेयर बाजार में हर तरफ लाल रंग फैला दिया, हरा रंग तो मोटा चश्मा पहनने पर भी नजर नहीं आया। चंद ही घंटों में निवेशकों के लाखों करोड़ रूपए धूल हो गए।
अडानी समूह ने फिर भी अपनी भ्रमित करने की नीति को नहीं त्यागा। उसका एफ पी ओ जो आखिरी तारीख की सुबह तक मात्र 3 प्रतिशत भरा था उसके बारे में दोपहर तक घोषणा की गई कि वह शत प्रतिशत भर गया। अडानी भूल गए कि शेयर बाजार की अपनी सामूहिक बुद्धिमता होती है जहां किसी को विश्वास नहीं हुआ कि मात्र चंद घंटों में भारी घाटा खाते हुए कुछ लोग बीस हजार करोड़ रुपए लगा देंगे। अडानी समूह के शेयर्स की जम कर धुनाई हुई और शेयर बाजार बंद होने के बाद खबर आई कि अडानी ने एफ पी ओ वापिस ले लिया है और वह निवेशकों के पैसे वापस लौटा देगा। पर क्या वास्तव में पैसे आ रहे थे या प्रतिष्ठा बचाने के लिए ऐसे चेक ले लिए गए थे दो दिखावटी थे जिन्हे क्लियरिंग में भेजा ही नहीं जाना था? अडानी ने यह अध्याय भी अपारदर्शिता के साथ ही बंद किया।
कुछ लोग हिंडेनबर्ग को गालियां दे रहे हैं पर असली अपराधी अडानी समूह की अपारदर्शिता है। अडानी जैसे लोगों को याद रखना होगा कि जिस धन पर आपने साम्राज्य स्थापित किया है उसका नब्बे प्रतिशत हिस्सा जनता के धन का है, आप मात्र प्रबंधक हो। यदि टाटा, बिरला, महिंद्रा, इंफोसिस आदि की तरह पारदर्शी रहोगे तो स्थाई रहोगे वरना धूमकेतु की तरह से उभरोगे और कितने ही लोगों के जीवन को बर्बाद कर उसी की तरह गायब भी हो जाओगे।








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