जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार की महत्वकांक्षी योजना ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) पर पेंशन कोष नियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए), केंद्रीय वित्त सचिव के बाद अब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कर्मचारियों का एनपीएस (न्यू पेंशन स्कीम) का पैसा लौटाने की मांग को अस्वीकार कर दिया है। सीएम अशोक गहलोत ने पिछले दिनों पत्र लिखा था। अब जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि कानूनी रूप से यह राशि कर्मचारियों की है। इसलिए नियोक्ता को वापस नहीं की जा सकती, जैसा अन्य कर्मचारी लाभ के मामलों में होता है। केंद्र और राज्य की इस लड़ाई के कारण प्रदेश के 5 लाख कर्मचारी दुविधा में पड़ गए हैं। कर्मचारियों का पैसा रिस्क पर, हमें कानून बनाने का हक पीएफआरडीए पर बहस के दौरान बनी लोकसभा की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट में राज्य सरकार ने लिखा कि लेबर यूनियन और कर्मचारी संघ एनपीएस के विरोध में हैं। एनपीएस में पेंशन राशि बेहद कम थी, मिलने में भी बहुत समय लग रहा था। कर्मचारी भविष्य को लेकर आशंकित होने लगे। निजी क्षेत्र की जगह सरकारी नौकरी को तवज्जो देने की बड़ी वजह पेंशन व सामाजिक सुरक्षा थी। एनपीएस से सुरक्षा का भाव खत्म हो गया, प्रतिभावान युवा निजी क्षेत्र में ही जाने लगे। 2018 की कैग रिपोर्ट में कहा गया कि प्लानिंग-इम्प्लीमेंट के स्तर पर सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा देने में एनपीएस विफल है। 2021 में नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन ने इसके रिव्यू के लिए कमेटी बनाने की मांग की।पीएफआरडीए ने भी बताया है कि आईएल एंड एफएस के कारण जो परेशानियां हुई, उससे शेयर मार्केट में कार्मिकों के एनपीएस में जमा 1600 करोड़ रुपए डूबने के कगार पर पहुंच गए हैं। कर्मचारियों की मेहनत का पैसा हर सेकंड रिस्क पर है। ज्यूडिशियरी में सामाजिक सुरक्षा के लिए ओपीएस को ही लागू रखा है। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स में ओपीएस है। इसके मद्देनजर राज्य सरकार ने ओपीएस बहाल करने का निर्णय लिया। अभी तक 1 जनवरी 2004 से नौकरी लगकर रिटायर हुए 238 मामलों में ओपीएस का लाभ मंजूर किया जा चुका है। सातवीं अनुसूची में राज्य सूची की बिन्दु संख्या 42 कहती है कि स्टेट पेंशन, जो राज्य की समेकित निधि (कंसोलिडेटेड फंड) से दी जाएगी, उस पर राज्य को कानून बनाने का अधिकार है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लिखा कि राज्य सरकार ने जनवरी 2004 में अपने कार्मिकों के लिए एनपीएस का विकल्प चुना। 2010 में प्रदेश-एनपीएस ट्रस्ट के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसमें प्रावधान है कि राज्य सरकार पीएफआरडीए/एनपीएस ट्रस्ट के सभी निर्देशों का अनुपालन करेगी। पीएफआरडीए अधिनियम राज्य सरकार को जमा राशि या उस पर रिटर्न के प्रबंध की मंजूरी नहीं देता। यह राशि कर्मचारी की है, इसलिए नियोक्ता को नहीं लौटा सकते। पुरानी पेंशन स्कीम में लागत सरकारें स्वीकृत कर लेती हैं, इससे कल्याणकारी स्कीमों के लिए निधियों की उपलब्धता पर बुरा प्रभाव होता है। जैसा कि 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के पैरा नंबर 4.4 में उल्लेख है। दूसरी ओर, कार्मिकों की पेंशन की समग्र राशि बढ़ाने के लिए केंद्र ने एनपीएस में अंशदान 1 अप्रेल 2019 से 10 से 14 प्रतिशत किया है। कर्मचारियों को चिंता है कि केंद्र-राज्य की लड़ाई में एनपीएस में जमा उनके पैसे का क्या होगा? राज्य सरकार की ओपीएस इस शर्त पर लागू की है कि जो कर्मचारी ओपीएस लेगा, वह एनपीएस के पैसे विड्राॅ नहीं कर पाएगा। यह पैसा राज्य सरकार जमा करेगी। इससे कर्मचारियों का जीपीएफ दिया जाएगा। केंद्र के इनकार से कर्मचारी न तो एनपीएस से लोन ले सकता है, न उसके जीपीएफ के खाते में कोई राशि है। राज्य सरकार ने जीपीएफ कटौती शुरू कर दी, पर उनके पर्सनल अकाउंट ही नहीं खोले।