पक्षाघात वह रोग है जिसे काफी हद तक रोका जा सकता है और लाखों लोगों को शारीरिक एवम्
मानसिक पीड़ा से बचाया जा सकता है। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि लोगों को जागरूक किया
जाय कि इस रोग को आसानी से रोका जा सकता है। पक्षाघात अक्सर किसी अन्य कारण से होता
है जैसे कि उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, तंबाकू सेवन, कुछ हृदय रोग (एट्रियल फ्लटर तथा
फिबरीलेशन), असंतुलित कोलेस्ट्रॉल स्तर, मोटापा और आलस्यपूर्ण जीवनशैली।
लकवा यानि पक्षाघात में यह अति महत्वपूर्ण होता है कि रोगी को जितना शीघ्र हो सके विशिषज्ञ
चिकित्सक या अस्पताल में भिजवा दिया जाए क्योंकि इन परिस्थितियों में हर क्षण महत्वपूर्ण
होता है। यदि सही तरह से ध्यान न दिया जाए तो द्वतीय पक्षाघात हो सकता है जिसमें से
निकलना बहुत मुश्किल काम होता है। यदि कोई बच के निकल भी जाता है तो अति धनी लोगों
को छोड़ कर सामान्य परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो जाता है क्योंकि इलाज और देखभाल
बहुत महंगा होता है।
इसके अलावा ऐसे लोगो में बार बार न्यूमोनिया, गिरना पड़ना, पेट का संक्रमण, पेशाब से
संबंधि त रोग बार बार होने लगते हैं। याददास्त गायब हो जाती है, विचार करने की क्षमता
खो सकती है। भावनात्मक तौर पर व्यक्ति और परिवार सब बिखर जाते हैं। पर याद रखिए, एक
व्यक्ति की मजबूरी दूसरे का अवसर होती है तो फायदा उठाने वाले हितैषी बन कर आने लगते
हैं। चमत्कार के नाम पर एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी के अलावा टोटकेबाज भी मैदान
में उतर जाते हैं पर आखिरी परिणाम ज्यादातर मामलों में वही ढाक के तीन पात वाला ही
रहता है। पक्षाघात का एकमात्र इलाज इसको होने से रोकने ही है।
यदि जीवनशैली नहीं सुधारी जाती है तो फिर किसी तकलीफ की स्थिति में अस्पतालों को गालियां
देने, वहां तोड़फोड़ करने, चमत्कार या तथाकथित "देशी" दवाओं के देवीय वरदान
का आश्रय लेते कितने ही लोग देखे जाते रहेंगे। यदि आप का स्वास्थ्य आप के लिए सबसे
महत्वपूर्ण नहीं है तो किसी और के लिए कैसे हो सकता है? बेहतर जीवन जीना है तो जीवनशैली
को बेहतर करना ही होगा और एक शायर की बात को भी हमेशा याद रखना होगा :
इतना दानी नहीं समय, जो हर गमले में फूल खिला दे।
इतनी भावुक नहीं जिंदगी, हर खत का उत्तर भिजवा दे।


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