जब मन में पतझड़ पसरा है
तब तुम आये हो वसन्त
जीवन की पाँचों ऋतुएँ तो
गाते-रोते बीत गयीं
निकट रहे पनघट के लेकिन
साँसें सूखी रीत गयीं
अब जब घट में डर गहरा है
तब तुम आये हो वसन्त
माघ मास की शुक्ल पंचमी
हमसे कितनी दूर हुई
मन का शीत मिटायें कैसे
ये चिन्ता दस्तूर हुई
रिश्तों का जंगल छितरा है
तब तुम आये हो वसन्त
कितने मौसम देख लिये पर
तुमसे टूटी आस नहीं
किसी रोज़ भी आ जाओगे
टूटा यह विश्वास नहीं
यादों का जमघट बिसरा है
तब तुम आये हो वसन्त
झरे हुए पत्तों ने अब जब
उगने से इन्कार किया
खाद बनेंगे मिट जायेंगे
यह निर्णय स्वीकार किया
जब मन मरने पर ठहरा है
तब तुम आये हो वसन्त
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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