सरस्वती-वन्दना

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मात मेरी ! दे ऐसा वरदान

शारदे ! दे ऐसा वरदान

मुझे जैसे अनपढ़ मूरख  को

मिल जाये पहचान

मात मेरी ! दे ऐसा वरदान

शारदे ! दे ऐसा वरदान


अक्षर तक का ज्ञान नहीं है

कविता क्या लिख पाऊँगा

बिन तेरे आशीष के मैया

अपना मान गवाऊँगा

तेरी कृपा से ले सकते हैं 

शब्द मेरा संज्ञान 

मात मेरी ! दे ऐसा वरदान 

शारदे ! दे ऐसा वरदान


गीत-ग़ज़ल फिर लोग सुनें और

श्रोताओं को ज्ञान मिले

कविता के मंचों पर फिर से 

कविता को सम्मान मिले 

आज तो जुमले और चुटकुले

करते हैं अपमान 

मात मेरी ! दे ऐसा वरदान

शारदे ! दे ऐसा वरदान


नदियाँ सालिगराम बनातीं

वो पत्थर हो जाऊँ मैं

कवियों के दरबार का मैया

इक चाकर हो जाऊँ मैं

ज्ञान भले कम देना लेकिन

मत देना अभिमान

मात मेरी ! दे ऐसा वरदान

शारदे ! दे ऐसा वरदान



दोहे

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(1)

दिन में दिखती चाँदनी ,

दिखे रात को धूप । 

जाने ये क्या कर गया ,

वो वासन्ती रूप ।।

(2)

सूर्यकान्त जन्मे यहाँ , 

आया एक वसन्त ।

महाप्राण वे हो गये ,

कविता हुई अनन्त ।।

(3)

जब-जब भी ठिठुरा शिशिर ,

तन-मन करता सन्त ।

तब-तब मद रस मोद का ,

बनता मित्र वसन्त ।।

(4)

जिसके पहले ठण्ड हो ,

गर्मी जिसके बाद ।

उस वसन्त का हो भला ,

कैसे कुछ अनुवाद ।।

(5)

अलसायी सी देह है ,

बौराया सा नेह ।

अबके दुष्ट वसन्त से ,

बरसा ऐसा मेह ।।


मुक्तक

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(1)

प्रेम का फिर वो अन्त मत देना

बेवफ़ा कोई कन्त मत देना

जिसमें मन पीलिया का रोगी हो

अब के ऐसा वसन्त मत देना

(2)

चाह की आह जब अधूरी हो

मोद की वासना से दूरी हो

अब तो ऐसा वसन्त मिल जाये

जिसमें बस प्रेम ही ज़रूरी हो

(3)

फूल कलियों पे हो ख़ुमार बहुत

और भँवरों में हाहाकार बहुत

तब ही समझो वसन्त आया है

अपनी बाँहों में ले के प्यार बहुत

(4)

वो नहीं आदि-अन्त का मौसम

वो तो है चिर-ज्वलंत का मौसम

उसकी नज़रें कलाम करती हैं

उसकी आँखें वसन्त का मौसम


ग़ज़ल

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अब तो बस हद हो चली है अब न यूँ तरसाइये

रुत वसन्ती आ गयी है अब तो कुछ फ़रमाइये


तोड़ दीजे चाँदनी के नूर का सारा भरम

अब नक़ाबे-रुख़ उलट कर चाँद को शरमाइये


आप हैं इक शाख़े-गुल गुलपोश भी गुलपाश भी

गुलफ़िशानी कीजिये और गुलसिताँ हो जाइये


पाप क्या पुण्य क्या है होगा क्या और क्या नहीं 

छोड़िये अब डर ये सारे अब न यूँ घबराइये


आप का ही मुन्तज़िर है आप का ही है ग़ुलाम

कीजिये कुछ तो रहम अब दिल को मत तड़पाइये


कर न बैठें कुछ अलग सा हो न जाये कुछ ख़ता

अब परेशां हो गये हम और मत उकसाइये


हम हैं 'साहिल' आप अल्हड़पन की इतराती सी मौज

अब भटकना छोड़ दीजे और न ही भटकाइये


गीत

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स्वर हमारा सुनो

स्वर तुम्हारा सुनो

अब वसन्ती बने

एक धारा सुनो


बज रही बाँसुरी

बज रहा शंख है

रेत पर लिख रहा

मोर का पंख है

किस तरह हो रहा है

इशारा सुनो


कल रहा मल्लिका से 

अमलतास है

तृप्ति का सिन्धु अपने

बहुत पास है

क्षण मिलेंगे नहीं ये

दुबारा सुनो


मुस्कुराते हुए

जगमगाते हुए

गुनगुनाते हुए

गीत गाते हुए

फिर किसी को किसी ने

पुकारा सुनो

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

वसन्त-पंचमी//2022