फिर पलक तुमने झुकाई
साँझ फिर फैली धरा पर
फिर महक उठ्ठा है ये मन
फिर लगा मन्ज़र सुहाना
याद फिर आया है हमको
फिर से वो इक दिन पुराना
रात फिर हमको ये भाई
खिल उठा फिर प्रेम जीभर
फिर कहीं कलियाँ हँसी हैं
झूमते फिर फूल देखो
फिर मदिर सी गन्ध छाई
फिर है सब अनुकूल देखो
मोद ने फिर ली जम्हाई
फिर उड़े संयम के छप्पर
देह फिर कुछ कह रही है
नेह ने फिर राग छेड़ा
दृष्टि ने फिर माँग रक्खी
भाव ने फिर फाग छेड़ा
फिर हुई मन की सगाई
फिर प्रणय के गा उठे स्वर
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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