अंतहीन आपाधापी है
शहरी जीवन जीवन कब है
भीड़ बहुत पर है तन्हाई
छत है कोई ना अँगनाई
एक मुस्कुराहट नकली सी
हर चेहरे पर है छितराई
हँसी ग़ैर की संतापी है
और रुदन भी बेमतलब है
अगर गाँव में मिलती रोटी
क्यों खाते शहरों की सोटी
मोटे-मोटे बोझ उठाते
थकी हुई है बोटी-बोटी
पुण्य यहाँ लगता पापी है
कहाँ कृपा तेरी ओ रब है
है आँखों में नुक्ताचीनी
यहाँ गगन भी लगे ज़मीनी
पंचतत्व के पुतले हैं सब
लेकिन लगते सभी मशीनी
ज़ात सभी की ही खापी है
और फ़क़त पैसा मज़हब है
सिर्फ़ दिखावा सिर्फ़ बनावट
सिर्फ़ स्वार्थ ही बुने लगावट
इस बोझिल से कोलाहल में
वंशी भूल गयी वंशीवट
हुई ज़िन्दगी अभिशापी है
जीना भी लगता करतब है
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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