वक़्त कहती है जिसको ये दुनिया
वो बजर है न है घड़ी कोई
इसके साँचे की कोई शक्ल नहीं
इसमें कड़ियाँ न कोई काँटे हैं
ये न चुप है न शोर करता हुआ
इसकी आवाज़ है न लाठी है
ये किसी चक्र में नहीं है क़ैद
इसकी रफ़्तार है न चाल कोई
इसका सूरज न कोई चन्दा है
इसके होते कहाँ हैं रात या दिन
ये सितारों का कब रहा हामी
ये न नक्षत्र और न ग्रह देखे
ये न सतयुग है और न त्रेता है
इसका द्वापर न कोई कलियुग है
इसकी गिनती न कोई गणना है
इसके होते कहाँ हैं काल या युग
ये तो लड़ता नहीं है जंग कोई
ये न बलवान और न है कमज़ोर
इसकी अपनी न कोई सेहत है
जो कि होती है ठीक या कि ख़राब
इसका मौसम न कोई या माहौल
इसकी ऋतुएँ न कोई रंगत है
ये न देता वचन न तोड़ता है
इसकी न बात और न क़ौल कोई
ये न दर्पण है और न आईना
ये कहाँ देखता-दिखाता है
ये तो रहता है अपने कूज़े में
ये न आता कहीं न जाता है
ये न है ज़िन्दगी या मौत यहाँ
इसकी साँसें न कोई धड़कन है
इसका सच है न कोई झूठ कोई
इसका कुछ भी तो यार अपना नहीं
ये न हमसे कहीं भी बाहर है
वक़्त तो यार अपने अन्दर है
मन हमारा ही है भला या बुरा
वक़्त अच्छा बुरा नहीं होता
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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