सौंदर्य जिनका मानक है संसार में
कर रहे रूप-चौदस पे श्रृंगार वे
देखते हैं वे दर्पण को कुछ इस तरह
जैसे प्रतिबिम्ब में है कोई और ही
रूप अद्भुत है कितना है कितना अलग
कर रहा है ये दर्पण भी बस ग़ौर ही
जिसने उनको गढ़ा है पुरस्कार में
हो रहे उसकी क़ुदरत का उपहार वे
उनके माथे की बिंदिया दमकती है यों
भोर का सूर्य जैसे अचानक जगा
नैन काजल को देते हैं ऐसे जगह
जैसे चन्दा के मुख पर हो चन्दन लगा
माँग भरते हैं यूँ माँग के प्यार में
प्रीत के जैसे इकलौते हक़दार वे
उनके अधरों पे ऐसी अगन है सजी
जो सुखा दे गला जग की ही प्यास का
अपने यौवन पे उनका यकीं वो है जो
तोड़ ही दे भरम संयमी आस का
नेह के चढ़ रहे देह-व्यापार में
बन रहे प्राण लेने का आधार वे
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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