(1)
नेह की रागिनी को क्या समझो
देह की दामिनी को क्या समझो
चाँद का दाग़ देखते हो तुम
तुम भला चाँदनी को क्या समझो
(2)
लोग कहते हैं शुक्र का है सुरूर
है ज़रूरत ये इश्क़ की भी हुज़ूर
चाँद को भर के अपनी बाँहों में
हमने तोड़ा है चाँदनी का ग़ुरूर
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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