धार्मिक नगरी के रूप में देशभर में प्रसिद्ध मीरा नगरी मेड़ता में सोमवार से दो दिवसीय मीरा शरद महोत्सव का शुभारम्भ हुआ। महोत्सव के पहले दिन सोमवार शाम को हजारों शहरवासियों ने ऐतिहासिक कुण्डल सरोवर 5100 दीपदान कर रोशनी से जगमग कर दिया। यह नजारा हर किसी को अभिभूत कर रहा था।
मीरा महोत्सव के तहत कुण्डल सरोवर पर आयोजित इस कार्यक्रम को देखने मेड़ता शहर ही नहीं बल्किआस पास के गांवों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे। शाम गहराने के बाद यहां विदेशी कलाकारों ने नगाड़ावादन का अद्भुत प्रदर्शन किया। नगाड़ावादन के साथ ही कलेक्टर जितेंद्र सोनी की मौजूदगी में सरोवर पर महाआरती की शुरुआत हुई। शहरवासी सपरिवार इस अनूठे कार्यक्रम में शामिल हुए।
दीपदान के दौरान हमेशा शाम होते ही अंधेरे की आगोश में खो जाने वाला कुण्डल सरोवर 5100 दीपकों से रोशन हो गया। सारे घाट जगमग उठे। इस रोशनी से सराबोर कुण्डल के इस दृश्य को मोबाइल में कैद करने के लिए युवक-युवतियों में होड़ सी मच गई।
इससे पहले मीरा महोत्सव समिति के नेतृत्व में सुबह शहर की करीब 600 छात्राओं को धार्मिक स्थलों की यात्रा कराइ गई। इस दौरान सबसे पहले कुड़की और नीलकंठ महादेव मंदिर के दर्शन कराये गए। वहां भोजन कार्यक्रम के बाद सभी भंवाल माता मंदिर पहुंचे। यहां दर्शन के बाद भंवाल माता ट्रस्ट के द्वारा कन्या पूजन कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। इस दौरान SDM शैतानसिंह राजपुरोहित, गांधी दर्शन समिति के जिला संयोजक जगदीश नारायण शर्मा की देखरेख में सम्पूर्ण कार्यक्रम आयोजित किये गए। वहीं यात्रा की व्यवस्था का जिम्मा डीडी चारण ने संभाला।
कुण्डल सरोवर की महत्ता
दरअसल कुण्डल सरोवर मध्यकाल में मीरा बाई के दादा राव दूदा के जमाने से ही पवित्र है। किंवदंती के अनुसार मीरा बाई के चचेरे भाई राजा राव जयमल के शासनकाल में एक बार पड़ोसी राजा ने मेड़ता पर आक्रमण किया। मान्यता है कि उस समय जयमल भगवान चारभुजा की सेवा में मग्न थे ऐसे में भगवान चारभुजानाथ ने खुद जयमल का स्वरूप धरकर युद्ध किया और विजयश्री हासिल की। उसी समय उनके कान का कुण्डल युद्ध भूमि में गिर गया। जब जयमल ने मूर्ति के एक कान से कुण्डल गायब देखा। उन्होंने चारभुजानाथ के कुण्डल को खोजने के लिए युद्ध भूमि की खुदाई करवाई। इसलिए इस सरोवर का नाम कुण्डल सरोवर पड़ा।





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