अटलजी ने तीसरी बार शपथ ली
ऋषिकेश राजोरिया
केंद्र में मार्च 1998 में बनी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 413 दिन चली। लेकिन इससे पहले उसने राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 11 मई 1998 को जल्दबाजी में बुलाई गई एक प्रेस कांफ्रेंस में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण की घोषणा की। इसके दो दिन बाद 13 मई को फिर दो परमाणु परीक्षण किए गए। बाद में अटलजी ने जानकारी दी कि परमाणु कार्यक्रम पूरा हो चुका है।
भारत के परमाणु परीक्षण की खबरें पूरी दुनिया में छपी और अमेरिका से रिश्ते बिगड़ गए। भारत के जवाब में पाकिस्तान ने भी 28 मई को परमाणु परीक्षण किया। पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर तक बस यात्रा की। लेकिन इस बीच पाकिस्तान ने कारगिल पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान के 5 हजार घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारत के 30 हजार सैनिकों ने मुकाबला किया।
एक तरफ कारगिल युद्ध चल रहा था, दूसरी तरफ अटलजी की गठबंधन सरकार को गिराने की कोशिशें चल रही थी। सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बन चुकी थी और लोकसभा में विपक्ष की नेता थीं। तमिलनाडु में द्रमुक की सरकार थी। भाजपा की सहयोगी पार्टी जयललिता की अन्नाद्रमुक लगातार तमिलनाडु सरकार को भंग करने की मांग कर रही थी। तब अन्नाद्रमुक के 18 सांसद थे, जिनके दम पर जयललिता लगातार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) पर दबाव डालती रहती थी।
जयललिता तमिलनाडु में अपनी सरकार बनती देखना चाहती थी। ऐसा नहीं होने पर अन्नाद्रमुक ने राजग सरकार से समर्थन वापस ले लिया और लोकसभा में शक्ति परीक्षण की नौबत आ गई। इस मौके पर बसपा प्रमुख मायावती ने वादा किया था शक्ति परीक्षण के मौके पर उनके पांच सांसद मतदान में भाग नहीं लेंगे। लेकिन मतदान के दौरान उनके सांसदों ने विरोध में मतदान कर दिया और 17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई।
इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 272 सांसदों का समर्थन होने का पत्र राष्ट्रपति को सौंप कर सरकार बनाने का दावा पेश किया। लेकिन उनके पास बहुमत नहीं था, क्योंकि मुलायम सिंह यादव ने समर्थन से इनकार कर दिया था। उनके नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी के 20 सांसद थे। आखिरकार राष्ट्रपति केआर नारायणन ने लोकसभा भंग कर आम चुनाव की घोषणा कर दी। ये चुनाव 5 सितंबर से 3 अक्टूबर के दौरान हुए। इससे पहले कांग्रेस में बड़ी उठापटक हुई। सोनिया गांधी इटली की हैं, इस मुद्दे पर शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने उन्हें अध्यक्ष बनाने का विरोध किया। फलस्वरूप तीनों को पार्टी से निकाल दिया गया और इस तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा या एनसीए) नाम से 25 मई 1999 को नई पार्टी का गठन हुआ, जिसका दबदबा खास तौर से महाराष्ट्र में था।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान बिरजू भाई राजनीति से कुछ अलग हटकर कचरे से खाद बनाने की एक परियोजना को साकार करने में जुट गए थे। ठाणे (पूर्व) में उन्होंने किसी की भागीदारी में एक विशाल संयंत्र लगाया था। जब वह संयंत्र लग रहा था, तब मैं कई बार वहां गया था और उत्सुकता से सारी गतिविधियों को देखा करता था। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी संयंत्र का दौरा किया था। उस दिन मैं सदानंद गोडबोले के साथ गया था। सदानंद गोडबोले ने अंधेरी (पश्चिम) में हाउसिंग बोर्ड की योजना में एक मकान ले लिया था और भाइंदर से अंधेरी रहने चले गए थे। मैं उस दिन सुबह भाइंदर से ट्रेन से अंधेरी पहुंचा था और फिर गोडबोले के स्कूटर पर दोनों ठाणे पहुंचे थे। इस संयंत्र का उद्घाटन मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने किया था। उद्घाटन समारोह में मैं उल्हासनगर के दिनेश मालवीय, गुड्डू शर्मा आदि के साथ पहुंचा था।
लोकसभा चुनाव से साबित हुआ कि कांग्रेस अब भाजपा की तुलना में काफी पिछड़ चुकी है। 12वीं लोकसभा में जहां कांग्रेस के 141 सांसद थे वहीं 13वीं लोकसभा में उसके 114 सांसद रह गए। गौरतलब है कि दसवीं लोकसभा में जब नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने थे, तब कांग्रेस के 232 सांसद थे। कांग्रेस के भीतर नरसिंहराव का विरोध इस आधार पर शुरू हो गया था कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। आखिरकार उन्हें हटाकर सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया।
केसरी के अध्यक्ष रहते कांग्रेस के सांसदों की संख्या घटकर 141 रह गई। केसरी को भी कम सीटें मिलने के कारण हटाया गया और सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस ने 114 सीटें जीती और तब किसी ने विरोध नहीं किया कि इतनी कम सीटें क्यों मिलीं? लोकसभा चुनाव में राजग को 298 सीटों के साथ साफ बहुमत मिल गया। राजग में भाजपा सहित 22 पार्टियां शामिल थीं और तेलुगू देशम पार्टी बाहर से राजग को समर्थन दे रही थी। इस तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 अक्टूबर 1999 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

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