(1)

रिश्ते होते थे कभी ,

अब हैं बस अनुबन्ध ।

खोज रहे परिवार फिर ,

वही पुरानी गन्ध ।।

(2)

मूल हुई उपयोगिता ,

रिश्ते हैं अब ब्याज़ ।

पैसों में जाकर छुपे ,

सम्बन्धों के राज़ ।।

(3)

है समाज बाज़ार अब ,

घर भी हैं दूकान ।

अब रिश्तों का बोध भी ,

हुआ एक सामान ।।

(4)

त्यौहारों या पर्व पर ,

रिश्ते लगते रीत ।

प्रेम-सिक्त पर मन नहीं ,

लगे अधूरी प्रीत ।।

(5)

बस वाणी से हो रहा ,

सुख-दुख में सहभाग ।

बचा कहाँ परिवार में ,

वह सच्चा अनुराग ।।

(6)

एक इकाई हो रहे ,

अब सारे परिवार ।

फिर सोचो कैसे बचें ,

रिश्तों के व्यवहार ।।

(7)

जो रहता माँ-बाप सँग ,

रखता उनका ध्यान ।

करते उसके पुत्र भी ,

दिल से उसका मान ।।

(8)

जो बोया वो काटना ,

है रिश्तों का मूल ।

जो भी इसको भूलता ,

वो हो जाता शूल ।।

(9)

लेना-देना को करो ,

देना-लेना यार ।

देकर ही कुछ ले सको ,

तब चलते परिवार ।।

(10)

पैसों को सम्बन्ध पर , 

कभी न दो तरजीह ।

फिर देखो कैसे रहें

रिश्ते यहाँ सहीह ।।

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'