घनश्याम दुबे के साथ होली
ऋषिकेश राजोरिया
केंद्र में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की सरकार का कार्यकाल पूरा होने के करीब था। उन्होंने बहुत ही कुशलता से सरकार चलाई। मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया। पिछली प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने मनमोहन सिंह को मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया था। उस समय देश की आर्थिक परिस्थिति सुधारने के लिए केंद्र सरकार को सोना गिरवी रखना पड़ा था। मनमोहन सिंह ने देश को उस परिस्थिति से बाहर निकाला। देश में उदारीकरण की शुरुआत हुई। विदेशी निवेशकों के लिए देश की अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुल गए थे। लोगों की आर्थिक परिस्थितियां सुधरने लगीं। दूरसंचार क्रांति का दौर पहले ही शुरू हो चुका था। इसका श्रेय राजीव गांधी को दिया जाता है। फोन की डिजाइनें बदलने लगी थीं। पुश बटन फोन प्रचलन में आ चुके थे। महानगरों में लोग धड़ल्ले से पेजर का इस्तेमाल करने लगे थे। जगह-जगह पीसीओ (पब्लिक काल सेंटर) खुल गए थे। वर्ष 1995 गुजरते गुजरते लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी थी।
इसी दरमियान होली पर सुबह मैंने विचार किया कि किसके यहां जाना चाहिए। मैं सुबह गुलाल की पुडिया लेकर दुबेजी (घनश्याम दुबे) के घर बोरीवली पहुंच गया। उन्होंने बंगले के सभी गेट बंद करवा दिए थे और नौकरों से कह दिया था कि किसी को भी अंदर नहीं आने देना है। शायद वे होली के धमाल से दूर रहना चाहते थे। मैं बंगले में प्रवेश नहीं कर सका तो कुछ दूर स्थित एक पीसीओ से दुबेजी के लैंडलाइन पर फोन कर उलाहना दिया कि क्या होली से आप इतना घबराते हैं? आप गेट खुलवाइए। मेरे पास गुलाल की पुडिया के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने गेट खुलवा दिया। मैंने उनके माथे पर गुलाल लगाई। उन्होंने भी मुझे गुलाल से सराबोर किया और इसके साथ ही उनका मन बदल गया। वे तैयार होकर मेरे साथ निकले और फिर दोपहर तक कई परिचितों के यहां जाकर होली की शुभकामनाएं दीं। रमेश दुबे के घर भी गए, जिनके भतीजे से दुखी हो कर अंधेरी की छात्रा हेताली चंपानेरिया ने आत्महत्या कर ली थी और मामला उछलने के बाद रमेश दुबे को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ था। वे बातचीत के दौरान कह रहे थे कि मैं यह जानना चाहता हूं, वह पत्रकार अब कहां है, जिसने मेरे खिलाफ खबरों का बवंडर खड़ा कर दिया था। उनका इशारा चंदर मिश्र की तरफ था, जिसने अखबारी पत्रकारिता छोड़ दी थी और फिल्म निर्माण की तरफ मुड़ गया था। उनके कहने का मतलब था कि उनके खिलाफ खबर छापने वाला पत्रकार अब पत्रकारिता से ही बाहर है।
होली पर शाम को एक आयोजन दादर में होता था। वह शर्माजी की एक मिठाई की बड़ी दुकान थी, जिसमें रेस्तरां की तरह बैठने की जगह भी थी। शर्मा बंधु दो भाई थे और पत्रकारों का सम्मान करते थे। ओम प्रकाश सिंह, प्रेम शुक्ल सहित कुछ पत्रकारों का वहां नियमित आना जाना था। वे होली की शाम छत पर शानदार आयोजन करते थे। ठंडाई, मिठाई के साथ ही भोजन का इंतजाम होता था और हर चीज में भांग का समावेश होता था। सब वहां इकट्ठा होते, हंसी मजाक करते, चुटकुले, कविताएं, किस्से कहानी सुनाते। वह अब इतिहास का विषय है और वे दिन भूलने लायक नहीं हैं।
मई 1995 में अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी अलग पार्टी बना ली थी। चुनावों में कांग्रेस को दो मोर्चों पर मुकाबला करना पड़ा। एक तरफ भाजपा और उसके सहयोगी दल, दूसरी तरफ वाम मोर्चा और जनता दल का संयुक्त मोर्चा। जनता में किसी पार्टी की कोई लहर नहीं थी। नरसिंहराव की सरकार के दौरान हुए घोटालों की बड़ी चर्चा थी। हर्षद मेहता का शेयर घोटाला, राजनीति के अपराधीकरण पर एमएन वोहरा की रिपोर्ट, जैन हवाला कांड, दिल्ली का तंदूर कांड जैसे मामले काफी उछल रह थे।
अप्रैल 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इसमें त्रिशंकु संसद बनी। किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा को 161 और कांग्रेस को 141 सीटें मिलीं। भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं, इस आधार पर राष्ट्रपति ने 16 मई को अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवा दी। उस समय महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा सरकार थी। दाभोल में एनरान परियोजना के अगले चरण की मंजूरी बाकी थी। इस सिलसिले में एनरॉन की अधिकारी रेबेका मार्क बंबई पहुंची। मुख्यमंत्री मनोहर जोशी मंत्रालय में उनका इंतजार कर रहे थे। लेकिन वे मंत्रालय पहुंचने के बजाय बांद्रा स्थिति मातोश्री पहुंच गई और बाल ठाकरे से मिली। उन्हें शायद यह लगा कि महाराष्ट्र में कोई भी योजना बाल ठाकरे की मंजूरी के बगैर सिरे नहीं चढ़ सकती।
केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिन चली। इस दौरान एनरॉन की परियोजना को केंद्र से मंजूरी मिल गई। इस घटना को लेकर बाद में कई तरह की खबरें छपीं। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के 13 दिन बाद जब लोकसभा में शक्ति परीक्षण हुआ तो वाजपेयी सरकार हार गई। इस तरह अटलजी सिर्फ 13 दिन प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद संयुक्त मोर्चा गठबंधन ने सरकार बनाई और 1 जून 1996 को कर्नाटक के एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार 18 महीने चली। इसके बाद अप्रैल 1997 में इंद्रकुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री पद संभाला। उनको भी ज्यादा समय तक नहीं रहना था। मध्यावधि चुनाव की परिस्थितियां फिर बन रही थीं।
देश में कंप्यूटर का उपयोग बढ़ रहा था और इंटरनेट ने दस्तक दे दी थी। उन दिनों सदानंद गोडबोले ने कहा था कि पोर्टल बनाने की तरफ ध्यान देना चाहिए। जनसत्ता में प्रदीप सिंह उप स्थानीय संपादक पद का आनंद ले रहे थे। बंबई में कार्यरत साथियों के बारे में उन्हें पहले से जो फीडबैक मिला होगा, उसके आधार पर उनका व्यवहार था। मेरे साथ उनका व्यवहार शुरू में रूखा था। एक बार मैं पेज पर एक खबर लगवा रहा था, तो उन्होंने पेज मेकर के पास पहुंचकर अपने हाथ से पेज पर चिपकी ब्रोमाइड उखाड़कर फेंक दी थी और सबके सामने बेवजह अपमानित किया था। बहुत बाद में मेरे बारे में उनकी धारणा बदली। एक बार उन्होंने दफ्तर के सभी साथियों को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया। समय गुजरने के साथ ही बंबई में राहुल देव का असर छंटने लगा और प्रदीप सिंह की मौजूदगी दिखने लगी थी। दिल्ली में राहुल देव जनसत्ता के कार्यकारी संपादक के रूप में इस तरह शोभायमान थे, जैसे हंसों के बीच कौवा दिखता है। जाहिर है, ज्यादा समय तक कार्यकारी संपादक बने रहना उनके लिए मुश्किल था।

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