अपनी चाहत से हम डरे कितने
ज़िन्दगी के लिये मरे कितने
दोस्ती प्यार ज़र्फ़ हमदर्दी
हमने देखे हैं कटघरे कितने
ये जो खोटे हैं बस्तियों के हैं
लोग जंगल के थे खरे कितने
क़हक़हा एक भी न कट पाया
मेरे आँसू थे भोंथरे कितने
कैसी बारिश हुई है अबके बरस
पेड़ मुरझा गये हरे कितने
कितनी चिकनी समाअतें हैं यहाँ
शेर मेरे हैं खुरदरे कितने
हमको तो तिश्नगी का नश्शा है
कोई अब जाम भी भरे कितने
एक सहरा सा रह गया 'साहिल'
अब्र दरिया पे ही झरे कितने
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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