ऋषिकेश राजोरिया
वर्ष 1994 खत्म होते होते विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां बनने लगी थीं। भाइंदर के जिस फ्लैट को मैंने खाली किया था, उसमें रहने के लिए शीतला प्रसाद दुबे का भाई नहीं आया। उस फ्लैट में ध्यान माखीजा रहने लगा, जो राकेश दुबे का दोस्त था और जिसका एक लेख छापने के बाद राहुल देव ने चेतावनी दी थी कि यह आदमी दफ्तर में घुसने देने लायक भी नहीं है, इसके लेख कभी मत छापना। उसके ब्लैक लिस्ट में होने की जानकारी मुझे नहीं थी, इसलिए राकेश दुबे ने मुझे धोखे में रखकर उसका लेख छपवा लिया था। वह भाइंदर में शीतला प्रसाद दुबे के फ्लैट में रहने लगा तो उसके पास कोई सामान नहीं था। जरूरी बरतन वह मुझसे ले गया। वह खुद को राजस्थान का निवासी साहित्यकार बताता था। साथ ही यह भी दावा करता था कि उसने तीन चार उपन्यास लिखे हैं। एक उपन्यास रसकपूर था, जिसके बारे में जयपुर आने पर पता चला कि इसके लेखक तो आनंद शर्मा हैं। साथ ही राजस्थान में किसी ने भी ध्यान माखीजा का नाम भी नहीं सुना।
बंबई में वह किसी धार्मिक किताबों के प्रकाशक के यहां काम करता था और जुहू स्थित इस्कॉन के पदाधिकारियों से उसने नजदीकी बढ़ा ली थी। वह इस्कॉन के पीआरओ के रूप में भी काम करता था और इस्कॉन के तहत होने वाले कार्यक्रमों की खबर अखबारों में छपवाने की जिम्मेदारी निभाता था। राकेश दुबे से उसने जान पहचान बढ़ा ली थी। राकेश दुबे के जरिए मुझसे भी जान पहचान बढ़ गई और इस वजह से हम अक्सर इस्कॉन मंदिर जाने लगे। इस्कॉन में कई कार्यक्रम होते थे जिनके निमंत्रण हमारे पास पहुंच जाते थे।
इस्कॉन मंदिर के बगल में बड़ा होटल था और एक शानदार सभागार था। हमने वहां हेमा मालिनी की नृत्य नाटिका देखी। इस्कॉन के होटल में फिल्म जगत के कई लोगों का आना जाना रहता था। इस्कॉन मंदिर के पास ही पृथ्वी थिएटर था। एक बार हम चार लोग इस्कॉन में गए। मेरी मित्र अनुजा सिंघवी भी साथ मे थी। वहां एक पदाधिकारी ने हमारी आवभगत की और चारों को गीता की एक एक प्रति भेंट की। अनुजा गुजराती थी, इसलिए उसे गुजराती में छपी गीता दी। वह बहुत मोटी किताब थी, जिसके कवर पर लिखा था, श्रीमद्भगवद्गीता – यथारूप। अंग्रेजी में एज इट इज।
मैंने उस पदाधिकारी से पूछा कि इसके कवर पर यथारूप या एज इट इज क्यों लिखा है? उसने कहा, जैसा भगवान कृष्ण ने महाभारत के दौरान अर्जुन को गीता का उपदेश दिया है, यह वही है, एज इट इज। मैंने कहा, यह तो स्वामी प्रभुपाद का भाष्य है, जिसमें उन्होंने काफी कठिन शब्दावली का इस्तेमाल किया है, जैसे कृष्णभावनाभावित, इसका उच्चारण करने में ही अच्छा खासा व्यायाम हो जाता है। जो ओरिजनल गीता है, वह तो बहुत छोटी किताब है और गीताप्रेस गोरखपुर से छपती है, ज्यादातर हिंदू परिवारों में वही गीता रहती है।
मेरी बातों से वह पदाधिकारी परेशान हो गया। उसने हथियार डालते हुए कहा, बेसिकली, आइ एम ए कनवर्टेड हिंदू। मैं पहले क्रिश्चियन था। ईसाई धर्म छोड़कर इस्कॉन में शामिल हो गया। आपको मेरे से ज्यादा नॉलेज है। ऐसे में उससे क्या बात करता? इस्कॉन के गोविंदा रेस्तरां में हम कभी भी भोजन करने पहुंच जाते थे, जहां पैसे नहीं देने पड़ते थे। बाकी लोगों के लिए एक थाली 150 रुपए की थी। ध्यान माखीजा ने मुझे झांसा दिया कि वह एक फिल्म निर्माता के संपर्क में है और एक फिल्म की प्लानिंग हो रही है, जिसकी कई बैठकों में वह शामिल हो चुका है। भाइंदर में वह मेरे परिचितों से संपर्क बढ़ाने लगा था। राकेश दुबे के जरिए वह घनश्याम दुबे के कार्यालय तक भी पहुंच चुका था।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का मौका आया तो तमाम पत्रकार सक्रिय हो गए। टीएन शेषन ने जो आचार संहिता लागू की थी, उसके तहत चुनाव प्रचार में खर्च की सीमा तय होने से उम्मीदवारों के लिए अखबार ही प्रचार का प्रमुख सहारा थे। राहुल देव ने मुझसे पूछा कि चुनाव में क्या कर सकते हो? मैंने कहा, रोजाना किसी एक उम्मीदवार के साथ दिन भर रहूंगा और वह कैसे प्रचार करता है, कैसी उसकी दिनचर्या है, इसकी रिपोर्ट दे सकता हूं। उन्हें मेरा विचार पसंद आया।
10 जनवरी 1995 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का अधिसूचना जारी हो गई। 17 जनवरी तक नामांकन भरने की तिथि थी। 20 जनवरी नामांकन वापस लेने की तारीख थी। महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों पर 9 और 12 फरवरी को दो चरणों में मतदान था। अधिसूचना जारी होने के बाद मैंने चुनाव में रिपोर्टिंग करने का मन बना लिया। उम्मीदवारों की घोषणा होने के बाद मैं सक्रिय हो गया। सबसे पहले भाजपा प्रत्याशी चंद्रकांता गोयल के चुनाव प्रचार की खबर लिखी, जो बंबई की एक सीट से भाजपा प्रत्याशी थी। इसके अगले दिन कांग्रेस उम्मीदवार मनोरमा पाटिल का प्रचार कवर किया। फिर कुछ और उम्मीदवारों के साथ घूमा और उनके प्रचार का आंखों देखा हाल लिखा।
कॉलम हिट हो गया तो राकेश दुबे अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के बारे में लिखकर लाने लगा और मुझ पर दबाव डालने लगा कि यह अपने कालम में अपने नाम से छाप दो। यह दिमाग का दही जमाने वाली स्थिति थी। ऐसा पत्रकार मैंने पहले कभी नहीं देखा था। बिरजू भाई ने कालम पढ़कर तारीफ की और अनुरोध किया कि उल्हासनगर में पप्पू कालानी का चुनाव प्रचार भी देख लो। उस समय पप्पू कालानी जेल में रहते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहा था। संपर्क सूत्र के रूप में बिरजू भाई ने साईं बलराम का नाम बताया।

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