बंबई में सिलसिलेवार बम धमाके

ऋषिकेश राजोरिया  

एक दिन 12 मार्च 1993 को मैं शाम को पांच बजे दफ्तर पहुंचा तो पता चला कि दोपहर को बंबई में 12 प्रमुख स्थानों पर सिलसिलेवार बम धमाके हो चुके थे। यह विश्व में अपनी तरह का अकेला घटनाक्रम थाजिसमें दोपहर 1.30 बजे से 3.40 बजे के दरमियान 12 भीड़ भरे इलाकों में आरडीएक्स से सिलसिलेवार धमाके किए गए। 257 लोगों की जान गई और 717 लोग घायल हुए।

पहला धमाका 1.30 बजे बांबे स्टॉक एक्सचेंज की 28 मंजिला इमारत में हुआ। पूरी इमारत हिल गई, 50 लोगों की मौत हुई। इसके आधा घंटे बाद मस्जिद के पास कॉर्पोरेशन बैंक की मांडवी शाखा के सामने कार बम धमाका हुआ। इसके बाद पासपोर्ट ऑफिसवर्लीजुहू सेंटार होटलएयरइंडिया बिल्डिंगसहार एयरपोर्ट टर्मिनलहोटल सीरॉककत्था बाजारसेंचुरी बाजारप्लाजा सिनेमाजवेरी बाजार और माहिम काजवे की मछुआरा बस्ती में धमाके हुए। एयरइंडिया बिल्डिंग एक्सप्रेस टॉवर की बगल में है। मतलब जनसत्ता के दफ्तर के पड़ोस में। उस इमारत को आरडीएक्स लदी कार से उड़ाने की कोशिश की गई थी। लेकिन इमारत मजबूत थी। उसके बेसमेंट में कुछ नुकसान हुआ। ये धमाके दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी ने कराए थेजिसमें टाइगर मेमन और याकूब मेमन की प्रमुख भूमिका थी।

इस मामले में 21 मार्च 2013 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है और याकूब मेमन को 30 जुलाई 2015 को फांसी हो चुकी है। टाइगर मेमन अब तक कानून के शिकंजे में नहीं फंस पाया है। दाऊद इब्राहिम भी गिरफ्त से बाहर है। इतनी बड़ी घटना के बाद जाहिर हैअखबार की लीड खबरें बंबई से ही बाकी संस्करणों को जानी थी। विवेक अग्रवाल की मेहनत और बढ़ गई। अनिल सिन्हा को भी आराम छोड़ना पड़ा। हम लोग भी कापी तैयार करने में जुटे।

इस घटना के बाद तरह-तरह की बातें हुईं। यहां तक कहा गया कि ये बम धमाके दंगों का बदला लेने के लिए किए गए हैं। जनवरी में दंगों के बाद मार्च में बम धमाकों की यह घटना बंबई को पूरी तरह हिला देने वाली थी। इस माहौल में बंबई में हिंदी पत्रकारों की सक्रियता बढ़ रही थी। बंबई का विस्तार ठाणे जिले में दूर-दूर तक हो रहा था। कल्याण तक मुंबई के ही दायरे में आ रहा था। रहने की सस्ती जगह ठाणे जिले में होने से ज्यादातर पत्रकार ठाणे जिले में ही रहते थेजिसमें भाइंदर प्रमुख था। पहले मैं डोंबिवली में रह चुका था। अब भाइंदर में रहना शुरू किया था। नौकरी चल रही थी।

इस दौरान एक घटनाक्रम यह हुआ कि हिंदी पत्रकार संघ ने मुलायम सिंह यादव की ओर से भेजा गया 10 लाख रुपए का चेक लौटा दिया। कारण यह था कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पत्रकारों पर अत्याचार कर रही थी। ऐसी खबरें आने के बाद हिंदी पत्रकार संघ के पदाधिकारियों ने बैठक कर विचार किया कि चेक लेना चाहिए या नहीं। दस लाख रुपए कम नहीं होते हैं। लेकिन सबने एकराय होकर चेक लौटाने का फैसला किया।

अनिल सिन्हा उस मंत्री को पदाधिकारियों के पास लेकर आने वाले थेजो चेक भेंट करते। उनसे कह दिया गया कि हम चेक लेने में असमर्थ हैं। इसके कुछ दिनों बाद हिंदी पत्रकार संघ की ओर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह एक परिचर्चा थीजिसका शीर्षक था – सांप्रदायिकता के खिलाफ छपे अक्षरों का असर। इसके निमंत्रण पत्र के मुताबिक वक्ताओं के नाम थे केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंहसमाजसेवी असगर अली इंजीनियरनिदा फाजलीगणेश मंत्री और राहुल देव।

जिस दिन दोपहर तीन बजे यह आयोजन घोषित किया गया थाउसी दिन अर्जुन सिंह नवाब मलिक के सांध्यकालीन हिंदी अखबार सांझ समाचार का विमोचन करने के लिए बंबई आए थे। कार्यक्रम की पूर्व संध्या पर जब मैं दफ्तर में थातब किसी ने फोन कर कुछ देर के लिए प्रेस क्लब पहुंचने को कहा। वहां आलोक तोमर के साथ हरीश पाठक और हिंदी पत्रकार संघ के अन्य पदाधिकारी मौजूद थे। मैं भी कार्यकारिणी सदस्य थाइसलिए उन्होंने मुझे करीब 15 निमंत्रण पत्र देकर कहा कि कल चर्चगेट स्टेशन के सामने इंडियन मर्चेंट चैंबर में कार्यक्रम है। हाल पूरी तरह भरना चाहिए। कुछ निमंत्रण पत्र शांति स्वरूप त्रिपाठी को दे देना।

स्वतंत्र फिल्म पत्रकार त्रिपाठी भी कार्यकारिणी का सदस्य था और भाइंदर में रहता था। निमंत्रण पत्र देखकर मैंने पूछा कि यह कार्यक्रम कब तय हो गयाजवाब मिला कि कल अर्जुन सिंह बंबई में हैंइसलिए ताबड़तोड़ यह कार्यक्रम तय किया गया है। अगले दिन कार्यक्रम के दौरान अर्जुन सिंह ने सांझ समाचार का विमोचन तो कियालेकिन हिंदी पत्रकार संघ के कार्यक्रम में नहीं आए। उन्हें बुलाने के लिए अध्यक्ष द्विजेन्द्र तिवारी गए थेलेकिन उन्होंने अचानक तय कार्यक्रम में आने से इनकार कर दिया। उनके कार्यक्रमों की सूची में यह कार्यक्रम दर्ज नहीं था। असगर अली इंजीनियर भी नहीं आए और निदा फाजली भी नहीं आए।

मुख्य वक्ताओं की गैरहाजिरी में इन्स्टैंट वक्ता परिचर्चा में बोलने के लिए खड़े हुएजिनमें निखिल वागले और आलोक भट्टाचार्य प्रमुख थे। निखिल वागले ने कहाजहां तक सामना की बात हैउसे तो मैं अखबार ही नहीं मानता। वे अगला वाक्य बोलतेइससे पहले पिछली कतार में से पांच-सात लोग खड़े हुए और चिल्लाएतो तेरा अखबार कौनसा अखबार हैइसके बाद हंगामा शुरू हो गया।

वहां रखीं लोहे की कुर्सियां जोर से फर्श पर फेंकी गई। करीब एक दर्जन तथाकथित शिवसैनिकों ने मंच को घेर लिया। निखिल वागले की पीठ पर धौल जमाएशर्ट फाड़ दी। पानी से भरा हुआ कांच का गिलास दीवार पर फेंककर तोड़ दिया। और हमलावर बाल ठाकरे जिंदाबाद करते हुए सभागार की खिड़की का कांच तोड़ते हुए चले गए। आधा हाल खाली हो गया। मैं वहीं था। सबकुछ मेरे सामने हो रहा था। शांति होने के बाद एक व्यक्ति उठा और नारा लगाने की मुद्रा में कहने लगाअहिंसा डटी रहीहिंसा भाग गई। इसके बाद हाल में बचे हुए लोगों ने निखिल वागलेआलोक भट्टाचार्य और राहुल देव के भाषण सुने।

शाम को दफ्तर में राकेश दुबे ने कार्यक्रम की खबर बनाईशीर्षक लगायाहिंदी पत्रकार संघ के कार्यक्रम में शिवसैनिकों का प्राणघातक गमला। उसका उपशीर्षक थामहिला पत्रकार गंभीर रूप से घायल। राहुल देव ने खबर को ओके कर दियाजो मुझे पेज पर लगानी थी। मैं खबर लेकर राहुल देव के पास गया। कहायह खबर बहुत बढ़ा चढ़ाकर लिखी गई हैमौके पर मैं भी थावहां कोई प्राणघातक हमला नहीं हुआ।

केबिन में उस समय धीरेन्द्र अस्थाना भी थे। उन्होंने कहाऐसा कैसे कह सकते होमैंने कहालोहे की दो कुर्सियां गिराई गईंएक कांच का गिलास टूटा और चाय के कप मेज पर रखे थेमेज पर चादर बिछी थीचादर खींचने से वे सारे कप नीचे गिर गएएक खिड़की का कांच टूटाहमलावरों के पास बंदूक नहीं थीधारदार हथियार भी नहीं थेउन्होंने किसी को नुकसान भी नहीं पहुंचाया।

धीरेन्द्र अस्थाना ने कहाभारती की आंख में कांच घुस गयावह घायल हो गई है। मैंने कहाभारती पेज लगवा रही हैथोड़ी देर बाद विरार ट्रेन से वसई जाएगी। आंख में कांच घुसने से कोई काम करने लायक नहीं रहता। मेरी बात राहुल देव को बहुत बुरी लगी। उन्होंने स्थानीय संपादक के विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए खबर को उसी तरह पहले पेज पर लगवाया। यह खबर दिल्लीचंडीगढ़ और कोलकाता भी भेजी गई। उस खबर को लेकर बहस करने के बाद मैं जबरन शिवसेना समर्थक घोषित किया जाने लगा, जबकि मेरा शिवसेना से कोई लेना-देना नहीं था। मुझे साफ दिख रहा था कि शिवसेना के खिलाफ राजनीति में अखबार का दुरुपयोग हो रहा है।