अजब उसने लफ़्ज़ों की इफ़रात की

धुनें खो गयीं मेरे नग़मात की


हमी भीगने से हैं डर अब रहे

हमें ही तमन्ना थी बरसात की


चलाती है दौलत ही अब तो जहां

बची कोई क़ीमत न जज़्बात की


मुझे ही बदलना है इनका मिज़ाज

करूँ क्या शिकायत मैं हालात की


वो जिसने अदब को भी सहरा किया

उसी पे है बारिश इनामात की


थका सा है सूरज है अलसाया चाँद

यही अब कहानी है दिन-रात की


कहूँ क्या तुझे दिल कि तुझको ही तो

"बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की"


न 'साहिल' ने पूछा समुन्दर का रुख

न दरिया ने इस पर कोई बात की

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'