बड़े कवि

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वे कवि होना चाहते थे । कवि-सम्मेलनों के बड़े कवि उनको ख़ूब लुभाते भी थे । लेकिन दिक़्क़त यह थी कि उनके अपने कस्बे में ही उनकी कोई पहचान नहीं बन पा रही थी ।


फिर उन्होंने बहुत सोच-समझ कर एक युक्ति निकाली और सोशल मीडिया के ढेर सारे ऐसे ग्रुप्स से जुड़ गये जहाँ सीखना कम और सिखाना अधिक होता था ।


वहाँ वे अंधों में काना राजा थे , उनके अहम की तुष्टि होने लगी । ऐसे-ऐसे सम्मान भी उनको मिलने लगे जिनकी आयु दिनों की भी नहीं घण्टों की ही थी । 


उन्हें पता ही नहीं चला कि कब वे एक भजन-मण्डली में शामिल हो गये । रहा प्रश्न कवि होने का तो उनका यह अहम तो तुष्ट हो ही गया कि वे कवि हैं । 


हालांकि उनके कवि को उनके ही कस्बे में जानता अब भी कोई नहीं । क्योंकि उनकी वे सप्रयास रची गयी रचनाओं का स्तर , उनका कण्ठ और उनकी पढन्त को तो सब जानते ही हैं ।

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'