उदयपुर से भगवान प्रजापत की रिपोर्ट।
उदयपुर संभाग के प्राचीन भट्टियानी चौहट्टा स्थित महालक्ष्मी मंदिर में मंगलवार को प्राकट्योत्सव मनाया गया। डेढ़ साल बाद प्राकट्योत्सव पर श्रद्धालओं ने महालक्ष्मी के दर्शनों का लाभ लिया। लेकिन मंदिर में सभी अनुष्ठान कोरोना गाइडलाइन के अनुसार आयोजित होने से अनुष्ठानों का ऑनलाइन प्रसारण भी किया गया।
श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया कि यह मंदिर संभाग का सबसे प्राचीन मंदिर है। मंदिर में हर साल भव्य कार्यक्रम होते हैं लेकिन डेढ़ साल से कोरोना महामारी के चलते अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं को शामिल नही किया गया। इस बार सभी अनुष्ठानों में श्रद्धालु शामिल हुए। सबसे पहले मंगला आरती, पंचामृत अभिषेक किया गया, इसके बाद हवन हुआ जिसमें ट्रस्ट के पदाधिकारियों की ओर से आहुतिया दी गई। माताजी को स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार कराया गया।
महालक्ष्मी श्रीमाली समाज की है कुलदेवी।
इतिहासकारों की माने तो भट्टियानी चौहट्टा स्थित महालक्ष्मी मंदिर करीब 350 साल पुराना है। यह मंदिर महाराणा जगतसिंह के शासन काल में बना। इसका निर्माण राज्य में प्रजा के वैभव और विस्तार के उद्देश्य से किया गया। यहां स्थापित माताजी की मूर्ति भी विशेष है, जिसमें हाथी सूंड द्वारा जल कलश से लक्ष्मी का अभिषेक करते हुए दिख रहे हैं। भीनमाल में विराजित लक्ष्मी का भी यही स्वरूप है।
मेवाड़ में श्राद्धपक्ष की अष्टमी पर होती है गज सवार लक्ष्मी की पूजा।
मेवाड़ में श्राद्धपक्ष की अष्टमी को महिलाएं व्रत रखती हैं और घर पर मिट्टी से गज लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर पूजा करती हैं। दीवारों पर मांडणें भी बनाए जाते हैं। इसमें लक्ष्मी के चित्र, परिचायक चिन्ह हाथी, घोड़े-कमल, शंख, चांद-सूरज, खेल की सामग्री आदि होते हैं। पूजा के बाद महिलाएं एक-दूसरे को कथाएं सुनाती हैं। मेवाड़ के प्रसिद्ध गवरी नृत्य में भी अष्टमी का दिन बेहद खास है। क्योंकि इसी दिन गवरी में गड़ावण पर्व मनाया जाता है। जिसमें गज की सवारी का निर्माण किया जाता है। दूसरे दिन वलावण यानी सवा माह तक चलने वाले आस्था के प्रतीक इस पर्व का समापन हो जाता है। इस दिन गज पर सवार लक्ष्मी की पूजा की जाती है।


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