चंद्रशेखर का प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा
ऋषिकेश राजोरियाचंद्रशेखर प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन ज्यादा दिन नहीं रह सके, क्योंकि कांग्रेस ने आरोप लगा दिया था कि उनकी सरकार हरियाणा पुलिस से राजीव गांधी की जासूसी करवा रही है। यह आरोप लगने के बाद वे कांग्रेस के सामने नहीं झुके। उन्होंने 6 मार्च 1991 को तत्काल प्रभाव से प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और देश में लोकसभा चुनाव की संभावनाएं बन गईं। मई 1991 में तीन चरणों में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई। मैंने डोंबिवली में रहते हुए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में खाता खुलवा लिया था, जिसमें मैं वेतन के पैसे जमा करवा देता था और जरूरत के मुताबिक निकलवाकर खर्च करता था।
निर्माणाधीन इमारत में रहते हुए किराया नहीं लगता था। लोकल ट्रेन का पास बनवा लिया था। भोजन और चाय आदि पर भी ज्यादा खर्च नहीं था। इसके अलावा मुझे गायत्री के पास इंदौर भी पैसे भेजने होते थे। एक दिन बिपिन भाई ने मुझसे कुछ हजार रुपए उधार मांगे। कहा, जरूरत है। मैंने उन्हें पैसे दे दिए, मेरा बैंक खाता खाली हो गया। मैंने सोचा कि पैसे कहां जाएंगे, मिल जाएंगे। इस बीच उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी। दिल्ली जाकर चंद्रशेखर से बंबई उत्तर पूर्व लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी जनता पार्टी का टिकट ले आए। उनके पास न पर्याप्त साधन थे, न सुविधाएं, फिर भी वे लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। वे दिल्ली से अपने साथ राजकुमार शर्मा नामक एक व्यक्ति को ले आए थे, जो राजनीतिक कार्यकर्ता था।
बिपिन भाई मुझे और राजकुमार शर्मा को विमान से दिल्ली ले गए और पार्टी के केंद्रीय कार्यालय से पोस्टरों का गट्ठर लादकर बंबई लाने की जिम्मेदारी सौंप दी। राजधानी एक्सप्रेस का टिकट करवा दिया। करीब 12 हजार पोस्टरों के भारी भरकम गट्ठर को कुली ने हाथगाड़ी से प्लेटफार्म पर पहुंचा दिया। उनका वजन एक क्विंटल से ज्यादा ही होगा। हमने वे पोस्टर सवारी डिब्बे में लाद दिए। राजधानी एक्सप्रेस रवाना हो गई और हम रातभर टीटी के साथ उन पोस्टरों को लेकर उलझते रहे। प्रधानमंत्री के चित्र छपे हुए पोस्टर थे, इसलिए टीटी भी सख्त कार्रवाई नहीं कर रहा था। दिल्ली से बंबई तक राजधानी एक्सप्रेस चार स्टेशनों पर रुकती है। हम यही मना रहे थे कि किसी तरह बंबई पहुंच जाएं, फिर देख लेंगे आगे क्या होता है। आखिरकार अगले दिन सुबह राजधानी एक्सप्रेस बंबई सेंट्रल पहुंच गई। राजधानी एक्सप्रेस में गैरकानूनी तरीके से पोस्टर लादकर लाने के जुर्म में करीब 500 रुपए जुर्माना वसूला गया। हमने वे पोस्टर टैक्सी में लदवाकर घाटकोपर पहुंचा दिए, जहां एक होटल में बिपिन भाई ने कमरा ले रखा था।
चुनाव प्रचार का संचालन वे उसी कमरे से कर रहे थे। उनके पास कार्यकर्ताओं की भारी कमी थी और चुनाव लड़ने लायक पैसे भी नहीं थे। जानकारी मिली थी कि चंद्रशेखर ने बंबई की पांचों सीटों के लिए 15 लाख रुपए भिजवाए हैं। इस हिसाब से 3 लाख रुपए बिपिन भाई को मिलने चाहिए थे, लेकिन तन्ना नामक एक व्यक्ति, जिसके पास पैसे भेजे थे, वह जानता था कि कोई भी जीतने वाला नहीं है, इसलिए वह किसी उम्मीदवार को पैसे देने के मूड में नहीं था। वह 15 लाख रुपए में से कम से कम 10 लाख रुपए खुद रख लेना चाहता था। दिल्ली से पोस्टर लादकर बंबई लाना मेरे लिए नया अनुभव था। पोस्टर के गट्ठर पहुंच गए थे, लेकिन उनको चिपकाने वाला कोई नहीं था। जितने पोस्टर चिपकाए जा सकते थे, उतने पोस्टर बिपिन भाई ने कुर्ला, घाटकोपर, चेंबूर में चिपकवा दिए थे। बाकी धरे रह गए, जो बाद में उनके छोटे भाई कांजी भाई ने 800 रुपए में रद्दी में बेचे। उस दौरान मैं दिन भर बिपिन भाई के साथ रहता और शाम 6 बजे दफ्तर पहुंच जाता। पहले चरण के लोकसभा चुनाव में 211 सीटों पर मतदान हो चुका था।


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