घेर रही है मन का रक़बा

मीलों तक बंजारिन धुँध


खोज रही है जाने किसको

लेकर कोहरे का दर्पण

दर्पण भी ऐसा कि जिस पर

धूल हो चुकी है अर्पण

क्यों इस दर्पण के पानी को

ढूँढ रही पनिहारिन धुँध


इससे पाला पड़ा है जब से

सूरज दुबका-दुबका है

और ओस का कण-कण कितना

भीगा सुबका-सबका है

पड़ी धूप के पीछे कब से

बन कर एक भिखारिन धुँध


कैसी-कैसी हुई ढिठाई

इस तन की रँगरलियों में

ढली उम्र में बास रहा है

कचरा मन की गलियों में

हँसती है अब दिन-ठाकुर पर

देखो ढीठ चमारिन धुँध

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'