ढूँढ रहा है मन का माँझी 

फिर यादों की नाव पुरानी


वो यादें जो बहते-बहते

ख़ुद लंगर का रूप हुईं

वो यादें जो सागर सी थीं

वे इक सूखा कूप हुईं

वो यादें जिनसे नैया ने

पार उतरना सीखा था

वो यादें जाने कब कैसे

अश्कों का प्रारूप हुईं

उन यादों में छुपी हुई है

इस माँझी की प्रेम-कहानी


बेशक है ये नाव पुरानी

लेकिन अब भी बहती है

बहते-बहते ये नदिया के

हर ताने को सहती है

माँझी की ख़ूबी-खामी सब

देखी है इस नैया ने

कभी नहीं लेकिन कुछ कहती

अक्सर ये चुप रहती है

इस चुप्पी में बोल रही है

माँझी की इक उम्र सुहानी


माँझी ने नौका को ठेला

हरदम अपनी चाहों से

कितने तूफ़ानों की लहरें

बाँधी अपनी बाहों से

ख़ुदगर्ज़ी की पतवारों से

किये नाव पर घाव बहुत

मगर नाव ने दूरी रक्खी

आहों और कराहों से

इन आहों में बसी हुई है

माँझी की अनमोल निशानी

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'