ब्यूरो रिपोर्ट। 

अगर शोध किया जाए तो हमारी पुराणी परम्पराओं के जरिए भी विकास की नई धारा बहाई जा सकती है।  ऐसा ही कुछ होने जा रहा है प्रदेश के आदिवासी जिले बांसवाड़ा में।  यहाँ प्राचीन नोतरा प्रथा को अब बैंकिंग मॉडल के रूप में विकसित करने का काम हो रहा है। आदिवासियों में नोतरा प्रथा शादी-विवाह जैसे सामाजिक समारोहों में रुपये की कमी को पूरा करने के लिए अपनाया गया था। यदि किसी परिवार में शादी है तो वह नोतरा करता है। शादी में जो लोग भी आते हैं, वे अपनी इच्छा से सहयोग करते हैं। वर्तमान में आदिवासियों में 65 प्रतिशत आबादी अभी तक बचत से नहीं जुड़ी है। लोगों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए साहूकारों से अधिक ब्याज पर राशि लेनी पड़ती है और ये लोग कर्ज में दबते जाते हैं। समाज के लोगों को घर की छोटी-छोटी चीजों के लिए भी जेवर गिरवी रखने पड़ते हैं। यदि इसी प्रथा से आने वाले पैसों के लिए एक अलग से देश का पहला जनजातीय बैंक डवलप कर दिया जाए तो समाज के विकास में नया आयाम स्थापित कर सकते हैं। बांसवाड़ा में हर साल 400 नोतरों से 25 करोड़ रुपए तक जुटाए जाते हैं।

इससे वैवाहिक और अन्य सामाजिक कार्याें में खर्च की जाती है। 4 से 5 फीसदी लाेग ही ऐसे हाे सकते हैं, जाे नाेतरे में प्राप्त राशि में कुछ बचत कर पाते हैं। ऐसे  में अगली बार दूसरे किसी नाेतरे में जाने पर व्यक्ति काे फिर से व्यापारी, साहूकार से ब्याज पर राशि प्राप्त कर नाेतरे में शामिल हाेना पड़ता है। नाेतरे की खासियत यह भी है कि जितना उसने प्राप्त किया उससे 200 या उससे अधिक राशि उसे चुकानी पड़ती है।

अब 10-10 गांवों के क्लस्टर बनाकर ट्राइबल बैंकिंग विकसित करने की योजना है। शुरुआत गाेद लिए बड़वी गांव से इसी वर्ष दिसंबर तक होगी। पहले सोसायटी के रूप में इसे शुरू किया जाएगा। जिले में 446 ग्राम पंचायतें हैं। ऐसे में बैंकिंग माॅड्यूल के लिए हर 5 से 10 गांवाें का क्लस्टर तैयार कर वहां पर बैंक बनाई जा सकती है।