शादी
ऋषिकेश राजोरिया
नईदुनिया में काम करते हुए जब मेरी शादी हुई तो मैंने सिर्फ सात दिन की छुट्टी ली थी। शादी से बचने के लिए मैंने कई तरह की बचकानी हरकतें कीं, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। शादी से बचने का मेरा आखिरी ब्रह्मास्त्र था कि घोड़ी पर नहीं बैठूंगा। परिजनों ने उसका उपाय निकाल लिया। मेरी शादी सामूहिक विवाह में कर दी। श्री गौड़ मालवीय ब्राह्मण समाज के करीब 21 (पक्का याद नहीं) जोड़ों की शादी आखा तीज (2 मई 1987) को हुई, जिसमें मैं और गायत्री भी शामिल थे। शादी के बाद रिसेप्शन अलग से जनता वाचनालय, राजमोहल्ला में हुआ, जिसमें सभी मित्र, परिचित नव दंपती को आशीर्वाद देने के लिए पधारे। नईदुनिया से महेन्द्र सेठिया और अजय छजलानी (अभयजी के भाई) आए थे।
यह नईदुनिया की खासियत थी कि उसके मालिक अखबार में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को परिवार का सदस्य मानते थे और संकट काल में मदद के लिए तैयार रहते थे। शादी विवाह में भी उनकी अनिवार्य उपस्थिति रहती थी। शादी होने के बाद जब मैं काम करने दफ्तर पहुंचा तो किशोर शर्मा ने फरमान सुना दिया कि मैं अब रात में काम करूंगा। शाम 6 बजे से रात 2 बजे तक। शादी होने के तुरंत बाद ड्यूटी का यह समय हैरतअंगेज था और इस बात की मिसाल भी था कि किशोर शर्मा कितने परपीड़क व्यक्ति थे। खैर, यह शायद राजू की शिकायत बसंतीलालजी से करने का नतीजा था। लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा, सिवाय इसके कि नई शादी के बाद भी जीवन काफी संयमित रहा।
मैं रोजाना शाम को 6 बजे पहुंचता। किशोर शर्मा ध्यान रखते थे कि कौन कितनी बजे आ रहा है। कभी कभी सवा छह बज जाते थे। एक दिन उन्होंने मुझे सवा छह बजे आया देखकर घड़ी दिखाई और अनुशासन सिखाने लगे, समय की पाबंदी का महत्व समझाने लगे। उनकी शिक्षा का असर यह हुआ कि मैंने कभी भी समय पर नहीं पहुंचने की कसम खा ली। रात की ड्यूटी में आने वाले पवन गंगवाल, लक्ष्मीनारायण वर्मा सात बजे पहुंचते थे। मैं और अनिल शर्मा नए थे तो हमें छह बजे बुलाया जाता था। उस दिन के बाद मैंने छह बजे जाना बंद कर दिया। अगर समय पर पहुंचने की स्थिति होती भी तो मैं कुछ मिनट के लिए कहीं रुक जाता और साढ़े छह बजे से पहले दफ्तर पहुंचता। मुझे रोजाना देरी से आते देख किशोर शर्मा ने महेन्द्र सेठिया से शिकायत की। महेन्द्रजी के सामने मेरी पेशी हुई। मैंने दावा किया कि मैं आज तक लेट नहीं हुआ। पवनजी और वर्माजी तो सात बजे बाद आते हैं, मैं साढ़े छह बजे से पहले आ जाता हूं। महेन्द्र सेठिया समझ गए कि किशोर शर्मा जबरन परेशान कर रहे हैं। उन्होंने मामला खारिज कर दिया।
प्रूफ टेबल पर हर वह सामग्री कंपोज होने के बाद पहुंचती थी, जिसका अखबार में प्रकाशन होता। अखबार के अलावा विशेषांकों की तैयारियां भी चलती रहती। उनकी सामग्री भी प्रूफ टेबल पर पहुंचती थी। गैली प्रूफ के साथ नत्थी होकर ओरिजनल कापी प्रूफ टेबल पर पहुंचती थी। एक प्रूफ दो व्यक्ति मिलकर पढ़ते थे। एक के हाथ में गैली होती, दूसरे के हाथ में ओरिजनल कॉपी। एक पढ़ता, दूसरा गलती होने पर गैली में निशान लगाता। इस तरह की प्रूफ रीडिंग सिर्फ नईदुनिया में ही होती थी। प्रूफ टेबल पर वरिष्ठता के क्रम से प्रकाश जैन, पवन गंगवाल, लक्ष्मीनारायण वर्मा, जितेन्द्र चौहान, संजय तेलंग, जयंत कोपरगांवकर, अनिल शर्मा और कुछ अन्य लोग थे, जिनके नाम याद नहीं आ रहे हैं। छह सात लोग नाइट ड्यूटी में 6-7 बजे से रात 2 बजे तक रहते। बाकी लोग दिन में रहते। अखबार के चार संस्करण छपते थे। डाक संस्करण, भोपाल, थ्री स्टार और नगर संस्करण। पीटीआई की मशीन पर रोजाना आखिरी खबर के बाद रात को 2 बजे गुडनाइट लिखा आता था। रात में हम उस पर दस्तखत कर महेन्द्र सेठिया की टेबल पर रखने के बाद निकलते थे। इस तरह काम करते हुए मैं उप संपादक बनने की जुगाड़ में लगा रहता।


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