पदयात्रियों का वार्षिक सम्मेलन
ऋषिकेश राजोरिया
25 जून 1984 को कई पदयात्री भारत यात्रा केंद्र, भोंडसी में जुटे। पदयात्रियों का वार्षिक सम्मेलन हुआ, जो बगैर मंच बनाए अनौपचारिक बातचीत जैसा था। एक टेंट अवश्य लगा लिया गया था। चंद्रशेखर ने स्पष्ट किया कि वे भारत यात्रा केंद्र के माध्यम से सामाजिक सरोकार वाले गैर राजनीतिक कार्य करना चाहते हैं, जिससे समाज का भला हो। लेकिन जहां चंद्रशेखर हों, वहां राजनीति न हो, ऐसा होना व्यावहारिक तौर पर मुश्किल था। पदयात्रियों के सम्मेलन के बाद ज्यादातर पदयात्री लौट गए।
चंद्रशेखर रोजाना शाम को बैठक करते थे। जिसे कुछ लोग दरबार लगाना बोलते हैं। बैठक में आम तौर पर गपशप होती। किस्से कहानी होते। यह शाम पांच बजे से सात आठ बजे के बीच का समय होता। ऐसे ही एक दिन चंद्रशेखर अपनी झोंपड़ी के आंगन में बैठे थे। भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हो रही थी। चंद्रशेखर ने बताया कि एक उद्योगपति प्लास्टिक की शीट देने के लिए तैयार हो गया है, जिसे झील के तल पर बिछाने से पानी ठहरेगा। झील के तल पर पहली बार बारिश होने से सारा पानी जमीन सोख लेने वाली थी, इसलिए प्लास्टिक बिछाने का उपाय सोचा गया, जिससे झील कुछ तो भरी हुई लगे। वैसे भी झील को पूरी तरह, अच्छी तरह से भरने में दो तीन साल का समय लगना ही था। वह भी तब, जब अच्छी बारिश हो। अगले दिन प्लास्टिक की काली चद्दरों से भरा ट्रक आ गया। झील में कुछ स्थानों पर और उसके इस पार बने छोटे सरोवर में प्लास्टिक की चद्दरें बिछा दी गई।
झील का काम खत्म होने और कुछ मकान बन जाने के बाद काम बहुत कम हो गया। उस समय मनोरंजन का भी कोई साधन नहीं होता था। कहीं घूमने जाओ तो बादशाहपुर चले जाओ, अकलीमपुर और ठीकरी चले जाओ या गुड़गांव तक घूम आओ। गुड़गांव भी उस समय एक छोटा शांत कस्बा था। भारत यात्रा केंद्र की सीमा को लेकर एक बार अकलीमपुर के कुछ लोगों ने अड़ंगेबाजी की थी और वे इकट्ठा भी हो गए थे, तब चंद्रशेखर को खुद लाठी लेकर उन्हें भगाने के लिए जाना पड़ा। वहां मेरी अच्छी मित्रता तेजिंदर प्रकाश के साथ हो गई थी।
मधुरेश से ज्यादा नजदीकी नहीं बढ़ पाई। वह पटना में जयप्रकाश नारायण के घर के पास रहता था। चंद्रशेखर जनता पार्टी बनते समय जयप्रकाश नारायण के काफी नजदीकी थे, इसलिए मधुरेश से उनका अच्छा परिचय हो गया था और उन्होंने भारत यात्रा केंद्र के निर्माण में सहयोग के लिए उसे विशेष तौर पर बुलाया था। भोंडसी में रोजलीन और सूबी मान भी काफी समय रहीं। मानवीय कमजोरियां सभी में होती हैं, जिसके कारण कई उल्लेखनीय घटनाक्रम होते रहते हैं। मैं इस तरह की घटनाओं का जिक्र नहीं करूंगा कि कौन कब कहां किसके साथ किस स्वरूप में देखा गया। ये मानव चरित्र में अनायास उठते रहने वाले बुलबुले होते हैं, जिनकी वजह से समाज में हलचल मची रहती है।
भोंडसी में भीड़ काफी कम हो गई थी। तेजिंदर प्रकाश का लौटना मुझे अच्छा नहीं लगा। उसके साथ मेरी काफी बातें होती थीं। रजनीश पर, जे कृष्णमूर्ति पर, आध्यात्मिकता पर, राजनीति पर। वह काफी पढ़ा लिखा था और डॉक्टर सोम प्रकाश का इकलौता पुत्र था, जो हरियाणा में अंबाला जिले के मुलाना गांव में रहते थे। वे ब्रिटेन से शिक्षा प्राप्त करने के बाद मुलाना में आकर बस गए थे। मैं तेजिंदर प्रकाश को विदा करने के लिए गुड़गांव बस स्टैंड तक गया। उसके जाने के बाद मुझे भारत यात्रा केंद्र सूना सूना सा लगने लगा। आसमान में बादल घिरने लगे थे। बारिश का मौसम शुरू हो रहा था। केंद्र में माधवजी, रोजलीन, उमेश चतुर्वेदी, दिलीप छेड़ा, एकनाथ बावनकर, सोलंकी, उसकी पत्नी, और कुछ अन्य लोग, जिनके नाम याद नहीं आ रहे हैं, बचे।
इनमें से सिर्फ दिलीप छेड़ा ही ऐसा था, जिससे में तेजिंदर के बाद बहुत बातें करता था। वह पदयात्रा में बिपिन संगार के साथ बंबई से शामिल हुआ था और वकील का टाइपिस्ट था। उसने कई बड़े बड़े मुकदमों की सामग्री टाइप की थी, जिसमें राजेश खन्ना डिंपल कपाडिया के तलाक का मुकदमा शामिल था। वह बातचीत में कई चौंकाने वाली बातें बताता रहता था। इस तरह दिन कट रहे थे। एक दिन सुबह मंदिर के बगल में बने कमरे में बाथरूम में रखी बाल्टी से मग्गे में पानी लेकर मैंने हाथ धो लिए। इससे सोलंकी नाराज हो गया। वह कमरे में अपनी पत्नी के साथ मौजूद था। हालांकि वह आपत्तिजनक स्थिति में नहीं था। फिर भी वह मुझ पर आग बबूला हो गया और उसने मेरे साथ मारपीट कर ली।
इस तरह भारत यात्रा केंद्र में पहली बार मारपीट की घटना हुई। माधवजी के सामने। मौजूद पदयात्रियों को बहुत बुरा लगा। चंद्रशेखर का आना कम हो गया था। वे कभी कभी शाम को आते और काफी समय गुजारने के बाद लौट जाते। छेड़ा, एकनाथ बावनकर, किशोर पोत्तनवार सहित करीब आधा दर्जन पदयात्री मेरे साथ तुरंत चंद्रशेखर से मिलने दिल्ली पहुंचे। 3, साऊथ एवेन्यू लेन पहुंचकर चंद्रशेखर को पूरा घटनाक्रम बताया। चंद्रशेखर ने कहा, सोलंकी का इलाज करेंगे। आश्वासन प्राप्त कर हम वापस भोंडसी लौटे। माधवजी ने सोलंकी को काफी बुरा भला कहा और मुझे भी समझाया कि तुम्हारे बाथरूम में पानी लेने चले जाने से वह नाराज हो गया था। उसको लगा कि उसकी प्राइवेसी में खलल पड़ रहा है।
खैर, जो हुआ, वह तो हो ही गया था। यह वही सोलंकी था, जिसने पदयात्रा में मुझसे कहा था कि पहनने को कपड़े नहीं थे तो पदयात्रा में क्यों चला आया? वह जिस कमरे में बैठा अकड़ रहा था, वह मेरे सामने ही बना था। उसका फर्श तैयार करने के लिए जमीन समतल करते समय वहां बहुत बिच्छू निकले थे। वैसे भी तीन चार महीने की श्रम साध्य जिंदगी बिताने के बाद मैं कुछ ऐसा काम करना चाहता था, जिससे कुछ कमाई हो, क्योंकि मुझसे मेरे माता पिता को भी कुछ उम्मीदें थीं। भोंडसी में किसी तरह की कमाई के आसार नजर नहीं आ रहे थे।


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