बाहर कुछ भी नहीं रे पागल

स्वर्ग-नर्क सब मन में है


गर्म खौलते तेल-कढ़ाहे

तेरे ही मन में मिलते

और अलौकिक गन्ध से सुरभित

पुष्प इसी मन में खिलते

वैतरणी का दूषित सा जल

तेरे मन-आँगन में है


ये तेरा प्रारब्ध समूचा 

तेरे मन का धोखा है

यहीं बराबर करना है रे

जो भी लेखा-जोखा है

ये तेरा निष्कामी सा फल

तेरे ही दामन में है


पाप नहीं कुछ पुण्य नहीं कुछ

सब मन की संरचना है

मोमिन या काफ़िर होने से

तुझको मूरख बचना है

हूरों की आँखों का काजल

तेरे ही अंजन में है


दुख देगा तो दुख पायेगा

सुख देगा तो सुख होगा

इसी जन्म का दर्पण है वो

जिसमें तेरा मुख होगा

कल था कैसा क्या होगा कल

सब मन के कर्मन में है

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'