समझौतों के इस खँडहर में चीज़ नहीं कुछ छोड़नी
तेरा मेरा रिश्ता जैसे चमगादड़ औ रौशनी
जिन फोड़ों में बस मवाद हो उन पर चीरा ही बेहतर
ज़हरीली बोली का कीचड़ साफ़ करे कैसे मेहतर
जिसमें केवल खोटे सिक्के वो गुल्लक है फोड़नी
अहम भरी अलमारी तेरी सन्दूकों में अना बहुत
मेरे कमरे के पर्दों पर सन्नाटा है घना बहुत
और कुकर की सीटी लगती है लुहार की धौंकनी
तू मैं की दुर्गन्ध भरी है घर मछलीबाज़ार हुआ
ड्राइंग रूम के मछलीघर में दीमक का विस्तार हुआ
दिल में जो उठ्ठी दीवारें नहीं पुनः वे तोड़नी
©️✍ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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