वो
साँवली सी बच्ची
जब भी आती है
करौंदे तोड़ने
हमारे अहाते में
तो
मुस्कुराने लगता है
कनेर
गुदगुदी सी होती
दिखती है
गुड़हल को
एक नयापन
मालूम देता है
गुलाब की
गन्ध में
घास के चेहरे पर
होता है
एक कृतज्ञता का भाव
मीठा नीम
लगने लगता है
और अधिक मीठा
बदल जाता है
गान में
चहचहाना
चिड़ियों का
बढ़ जाती है
मादकता
हवाओं की
जेठ की तप्त दुपहरी
हो जाती है
सावन की
फुरहरी साँझ
अचानक ही
हो जाता है
पूरे माहौल
और मन पर
एक
जादू-टोना !
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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