बीत गया आषाढ़ी हफ़्ता

कब आओगी बरखा रानी


कितना जबरा जेठ तपाया

गात-गात भू का गर्माया

प्यास हुई थी पपड़ी-पपड़ी

झुलस उठा पानी घबराया

ऐसा बरसा यहाँ पसीना

देह हुई थी पानी-पानी


झेल गये हम लूऐं सारी

करते पुरवा की तैयारी

और नौतपा भी तो निकला 

कितना मुश्किल कितना भारी

सोचा था अब तो करनी है

मानसून की ही अगवानी


लेकिन अब तो उमस बहुत है

और आदृता विरस बहुत है

कहीं नहीं दिखती है बारिश

पर बारिश पर बहस बहुत है

अब तो देखो बहुत हो गया

आ जाओ मौसम की रानी 


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)