हाथरस से वापसी
कर्णवास से मेरा बीच में हाथरस लौटना शायद बालकृष्ण गर्ग को अच्छा नहीं लगा। उनके बड़े भाई लक्ष्मीनारायण गर्ग बंबई में रहते थे। उसके बावजूद संगीत कार्यालय में उनकी हैसियत पहले नंबर की थी। बालकृष्ण गर्ग दूसरे नंबर पर थे। मुझे लक्ष्मीनारायण ने संगीत कार्यालय में काम करने भेजा था। वे मेरी लेखन क्षमता बंबई में अच्छी तरह जांच चुके थे। प्यारेलालजी ने मेरी सिफारिश की थी, इसका भी महत्व था। मैं अंग्रेजी माध्यम से बी एससी कर चुका था। मंदिर में शान से रहता था। वहां आने वाले श्रद्धालु मुझे महाराज या पंडितजी कहकर संबोधित करते थे। कई लोग चरण स्पर्श भी करते थे।
हाथरस में बालकृष्ण गर्ग ने मुझे काका का नौकर बनाने की बेवकूफी की। काका को समझ में आ गया था कि इस लड़के को नौकर बनाकर रखना ठीक नहीं। उन्होंने ससम्मान मुझे वापस भेजा और अपने पुराने नौकर को बुला लिया। हाथरस में बालकृष्ण गर्ग मुझसे कई तरह के फालतू काम करवाने लगे। कभी कुछ लिखने के लिए कहते, फिर उसे जांचते, मीनमेख निकालते, ये देखो तुमने भ को म की तरह लिख दिया है। फ क की तरह दिख रहा है। इस तरह मेरी हैंडराइटिंग और सुधर गई। प्रूफ पढ़ता तो कहते कि बहुत सावधानी रखने की जरूरत है। एक भी मात्रा बदल गई तो राग बदल जाता है। संगीत पत्रिका से मेरा परिचय बचपन में ही हो गया था। मध्य प्रदेश में देवास जिले के खातेगांव में रहते समय बाबूजी डाक से पैसे भेजते थे तो पत्रिका घर आ जाती थी। उस पत्रिका को मैं हाथरस में छपते हुए देख रहा था।
पढ़ना, लिखना और बालकृष्ण गर्ग जो कहें, वह करना, यही काम था। उस दौरान मैंने एक कहानी भी लिखी, जिसका सार यह था कि एक गांव में एनएसएस का शिविर लगा था। वहां एक भैंस पागल हो गई और एक पेड़ से सिर टकराते-टकराते अधमरी हो गई। गांव के कुत्ते उसके आसपास जुट गए और उसका मांस खाकर पागल होने लगे। गांव में आतंक फैल गया। ऐसी परिस्थिति में एनएसएस के छात्रों ने क्या भूमिका निभाई, इसका वर्णन कहानी में था। वह कहानी मैंने बालकृष्ण गर्ग को पढ़ने के लिए दी। उन्हें अच्छी लगी। उन्होंने वह अपने पास रख ली। उनके स्वभाव और व्यवहार से साफ था कि वे मुझे संगीत कार्यालय की मुख्यधारा में लाने के पक्ष में बिलकुल नहीं थे।
इस बीच एक बार मैं मुंशी के साथ मथुरा गया, लक्ष्मी टाकीज में राजपूत फिल्म देखी, फिर गोवर्धन परिक्रमा की। वृंदावन, गोकुल घूमा। रास्ते में कुंड देखे। एक जगह रास्ते के किनारे खुले स्थान पर लोग पत्थर जमा रहे थे। यह कार्य वे अपना घर बनने की कामना के साथ कर रहे थे। मैंने भी देखादेखी एक जगह कुछ पत्थर जमाए। गोवर्धन यात्रा करने के बाद हाथरस में कुछ दिन गुजरे थे कि जम जूं ने परेशान कर दिया। यह शरीर के रोम छिद्र पर काले धब्बे जैसी दिखती है, और कांख में, कमर के पास ज्यादा होती है। इसके कारण शरीर में बहुत खुजली होती है।
एक तरफ बालकृष्ण गर्ग का रवैया, दूसरी तरफ जम जूं, साथ ही आगे की चिंता। बंबई के राम मंदिर में रहते हुए मेरा वजन 10 महीनों में 9-10 किलो बढ़ गया था। हाथरस में रहते हुए वह छह-सात महीनों में ही इतना कम हो गया। एक बार बालकृष्ण गर्ग की इच्छा मुझे कुछ कपड़े दान करने की हुई। उनकी पत्नी मुझे कुछ पुराने कपड़े देने लगी। इनमें लक्ष्मीनारायण गर्ग के बेटे अशोक की पहनी हुई पुरानी पैंट थी, दो तीन बनियान थी, जिसे बालकृष्ण गर्ग पहनकर त्याग चुके थे। कुछ शर्ट थी। मैं उन कपड़ों को देखकर सोचने लगा कि अब हाथरस से निकल लेना चाहिए। ये लोग ठीक नहीं है। सामान समेटकर मथुरा पहुंचा। रतलाम का एक टिकट लिया और प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन में बैठ गया।
मैंने किसी जनता एक्सप्रेस का टिकट ले लिया था और सर्वोदय एक्सप्रेस में बैठ गया था। टीटी से मैंने कहा कि गलती हो गई, मुझे रतलाम पहुंचना है। टीटी ने मेरे साथ सहानुभूति दिखाई और मुझे उस जगह बैठाया, जहां टीटी बैठे थे। रतलाम स्टेशन पर उस टीटी ने मुझे अपने साथ ट्रेन से उतारा और रेलवे के पोस्ट ऑफिस के रास्ते से स्टेशन से बाहर निकाल दिया। चाय भी पिलाई। इस तरह हाथरस में अपना दानापानी समाप्त हुआ और अपन रतलाम से अपने घर इंदौर पहुंच गया।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


1 टिप्पणियाँ
अच्छा और सधा हुआ लिखा है.. भाई साब. आपके संस्मरण पुस्तक रूप में आवे.. तो ज्यादा अच्छा रहेगा.. नवोदित पत्रकारों को भी आपकी रोचक शैली में लिखी संघर्ष गाथा अच्छी लगेगी। 12 वे अंक में जम जूं का प्रसंग अच्छा लगा... नई पीढ़ी को तो शायद इस बला के बारे में पता ही नहीं होगा।
जवाब देंहटाएं