ब्यूरो रिपोर्ट!
राजस्थान विश्वविद्यालय मैं ₹5000 रुपए प्रतिमाह के अल्प वेतन में कार्य कर रहे एक संविदा कर्मी बिरजू तंवर के ऐसा जुनून सवार हुआ कि उन्होंने अपने निर्धारित कार्य के अतिरिक्त राजस्थान विश्वविद्यालय के सुनसान पढ़े खेल मैदान से सटे लगभग 50 बीघा क्षेत्र को पहले तो प्रतिदिन प्रातः 3 घंटे की नियमित मेहनत कर साफ किया और इसके बाद वर्षा ऋतु आते ही उसमें कई किस्म के पौधे लगाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 2015 से अब तक वे करीब पांच हजार से अधिक पौधे इन मैदानों में लगा चुके हैं। इन पौधों में से 2714 पौधों ने आज वृक्ष का रूप ले लिया है। कोरोना के इस काल में जब ऑक्सीजन ने अपना महत्व आम जन को महसूस करवाया है ऐसे समय में कितने मेट्रिक टन ऑक्सीजन उनके इस कार्य से विश्वविद्यालय को मिल रही है इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। एक सुंदर उधान बन चुके इस क्षेत्र को देखकर लोग दंग रह जाते हैं
दरअसल राजस्थान विश्वविद्यालय में वर्ष 2015 में कुलपति के रूप में जयपुर के तत्कालीन संभागीय आयुक्त हनुमान सिंह भाटी को विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार मिला। हनुमान सिंह भाटी को हरियाली से तगड़ा लगाव था। विशेष रुप से वर्षा के समय पौधे लगाने का एक विशेष ही जुनून था। उस समय राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति के साथ ही उनके पास जोबनेर के कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति का भी अतिरिक्त कार्यभार था। इसी दौरान वर्षा ऋतु में कुलपति भाटी के निर्देशों से जोबनेर कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों की ओर से विशेष किस्म के आम, शहतूत, आंवला, जामुन, अशोक, नीम और शीशम सहित अनेक औषधियों के हजारों पौधे निशुल्क रूप से उपलब्ध कराए गए।
इन्हें कैसे लगाना है वह इनकी कैसे उचित देखरेख की जा सकती है, यह प्रशिक्षण भी उस समय उनके द्वारा दिया गया । संविदा कर्मी बिरजू तवर जो हरियाणा से आकर बहुत लंबे समय से दीन हीन हालत में अकेला ही विश्वविद्यालय में ही रह कर जीवन यापन करता है, उसने भी यह प्रशिक्षण लिया। बिरजू रोजाना सुबह 5:30 बजे से 8:30 बजे तक स्वयं हाथ में फावड़ा लेकर इन्हें पानी देने के साथ ही समय पर खाद, कीटनाशकों का छिड़काव करता है। कुछ अन्य कर्मचारियों जिनमें बनवारी, गगन नेगी और डॉ राजेश पुनिया जैसे शिक्षकों के साथ कड़ी मेहनत के साथ कर रहा है। इसी की मेहनत का परिणाम है कि उस समय लगाए गए पौधों में से 2714 पौधों ने आज वृक्ष का रूप ले लिया है और कई पौधों में फल भी आने शुरू हो गए ।




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