जब पलटे मन के पन्ने
यही कहानी देखी है
प्रेम अगर किरदार हुआ
दुख का पारावार हुआ
आँसू का मुस्कानों पर
कितना घातक वार हुआ
कान्हा की मीरां हरदम
दर्द दिवानी देखी है
भले कहानी बोल उठे
अपना सब कुछ खोल उठे
फिर भी कुछ अनदेखे से
हरदम इसमें झोल उठे
लफ़्ज़ों के भीतर कोई
शै अनजानी देखी है
जब खेला जम पाता है
जब जब भी मन गाता है
जाने किसके कहने से
पर्दा ही गिर जाता है
ये दुनिया भी दुनिया ने
आनी-जानी देखी है
मन का सहरा ख़ूब तपे
जाने कितने पेड़ खपे
साँसों की सरगम भी ये
चाहे जितनी चाह जपे
बारिश में जब डूब गये
तब गुड़धानी देखी है
हर पन्ने पर आस लिखी
वो भी ख़ूब उदास लिखी
नदिया ने जब होंठों पर
एक सनातन प्यास लिखी
एक लहर तब साहिल ने
पानी-पानी देखी है
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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