दिल दिमाग़ से बोल उठा
मुझसे ऐसी बात न कर
तुझको तो दिखता है बस
हानि-लाभ ही क्यों हरदम
दिखे न जीवन का संगीत
और न ही इसकी सरगम
सिर्फ़ गणित को ही ले कर
गुणा-भाग दिन-रात न कर
कभी-कभी खोने में भी
पाने का सुख मिलता है
जीत-हार से आगे ही
फूल प्रेम का खिलता है
घात मिले तो बिसरा दे
तू कोई प्रतिघात न कर
बुद्धि और आनन्द भला
एक यहाँ कब हो पाये
मेरे ही रस्ते पर चल
जो होना सो हो जाये
सोच-सोच कर यूँ अपने
घायल सब जज़्बात न कर
सही-ग़लत की परिभाषा
सबकी अपनी-अपनी है
पाप-पुण्य वाली कोई
माला ही क्यों जपनी है
अगर-मगर में जीवन के
रस को विष की ज़ात न कर
भटकूं यदि ठोकर खाकर
तो तू लेना थाम मुझे
अभी मगर हर चाहत का
पीने दे तू जाम मुझे
उचित लगे तब कर लेना
बात अभी बेबात न कर
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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