कल मुख्यमंत्री राजस्थान के ओएसडी और हमारे अज़ीज़ फ़ारूक़ आफ़रीदी ने राजस्थानी गीतों के सुमधुर व सुविख्यात गीतकार कल्याण सिंह राजावत(जो पिछले सात सालों से लकवाग्रस्त हैं और इसी लकवे के कारण उनकी बोली भी चली गयी है) के साथ अपना एक पुराना फ़ोटो फ़ेसबुक पर साझा किया । मित्रों ने फ़ोटो को लाइक भी किया और कल्याण सिंह जी को अपने-अपने ढंग से स्मरण भी किया । 


सबसे मआनीखेज़ टिप्पणी रही मेरे भाई विनोद पदरज की । पदरज मुझे बहुत ही अधिक प्रिय हैं और पूरे राजस्थान में अतुकान्त कविता के मामले में उनसे बेहतर मुझे और कोई नहीं लगता । लोक-जीवन और मनुष्य के मन की जैसी अद्भुत व मर्म को छूने वाली अभिव्यक्ति विनोद भाई अपनी कविताओं में करते हैं , वह लासानी है और मुझ जैसे छन्द के तालिबानी-समर्थक को अतुकान्त कविता से प्यार करना सिखाती है । विनोद उस करुणा के बहुत बड़े गायक हैं जिससे पूरा काव्य व उसका गान उपजा है ।


विनोद पदरज ने अपनी टिप्पणी में लिखा "क्या कल्याण सिंह राजावत , रघुराज सिंह हाड़ा और दुर्गादान गौड़ को राजस्थानी भाषा की अकादमी का सम्मान मिला और यदि नहीं मिला तो फिर किनको मिला ?"


विनोद भाई की इस टिप्पणी ने बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया । जिन तीन नामों के हवाले से यह प्रश्न उठाया गया है , वह प्रश्न वास्तव में बहुत बड़ा तो है , साथ ही वह एक निष्पक्ष उत्तर भी चाहता है । 


उपरोक्त तीनों कवियों की काव्य-यात्रा लगभग आधी सदी की है । पचास साल की यह यात्रा ऐसी है कि राजस्थानी ठीक से न समझने वाले लोगों को भी इन तीनों की कई पंक्तियाँ कंठस्थ हैं । कल्याण सिंह जी की "बेलड़ी" में एक उपमा "काया ताता दूध सी उफनाबा लागी" तो ऐसी है जिसके लिये डॉ. ताराप्रकाश जोशी कहते थे "दुनिया के किसी साहित्य में ऐसी विलक्षण उपमा देखने को नहीं मिलेगी ।" हम सब जानते हैं कि ताराप्रकाश जी स्वयं उपमाओं के बादशाह थे । उनके गीतों में जब भी "जैसे" , "ज्यों" , "जिस तरह" , "मानो" आदि शब्द आते थे तो मेरे कान खड़े हो जाते थे कि देखें अब क्या उपमा आने वाली है । ऐसी ही कमाल की उपमा दुर्गादान सिंह गौड़ के यहाँ है जिसमें वे नायिका की चाल को थाली में मूँग ढुलने की तशबीह देते हैं । ख़ैर ! जोशी जी बात फिर कभी , फ़िलहाल तो बात उन त्रिदेवों की जिनकी ओर विनोद भाई ने संकेत किया है । 


प्रश्न यह खड़ा होता है कि हमारे साहित्य के  मूल्यांकन का काम जिन तथाकथित लोगों के हाथ में है , क्या वे बिना किसी वाद-विशेष से प्रभावित हुए , बिना किसी जानिबदारी के , बिना निजी पसन्द-नापसन्द के , बिना किसी गिराने-उठाने के खेल में शामिल हुए , बिना छांदस या छंदहीन के झगड़े में पड़े , बिना लोकप्रिय कविता बनाम अच्छी कविता का मुक़द्दमा दायर किये अपना काम ठीक से कर रहे हैं अथवा नहीं ? और यह प्रश्न केवल राजस्थानी भाषा तक ही सीमित नहीं है , हिन्दी-उर्दू व अन्य भाषा-बोलियाँ भी इस प्रश्न के दायरे में हैं । 


आख़िर वे कौन लोग हैं जिन्होंने फ़िल्म और मंच की अच्छी कविता को भी सिर्फ़ इसलिये ख़ारिज कर दिया कि वह लोकप्रिय है । और ख़ारिज भी इस बेशर्मी से किया कि जब लोकप्रिय कविता छप कर किताब की शक़्ल में आयी तब भी उसे इग्नोर ही किया । जिस कविता का इन आलोचकों ने संज्ञान लिया क्या वह कविता पुस्तकालयों और पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त कहीं है ? इस कविता के सामाजिक सरोकार समाज की ज़ुबान पर हैं ? मज़ेदार बात यह कि इनमें से अधिकांश कविताएँ सामाजिक सरोकार की कविता के नारे को ढोने का दावा भी करती हैं । लेकिन इन कविताओं का कोई सामाजिक सरोकार समाज से कोई सरोकार रखता है ?


मेरी अत्यन्त तुच्छ व विनम्र राय में कविता की आलोचना ने संज्ञान , समीक्षा , सम्मान और पुरस्कार की आड़ में ऐसा गन्दा खेल खेला है जिसने कविता की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम ही किया है । और एक ऐसे कविकुल को खड़ा किया गया है जिसके पास बैसाखियाँ भी ख़ुद की नहीं हैं ।


प्रसंगवश बताता चलूँ कि एक बार भोंडसी में मैं , नरसिंहाराव(पूर्व पीएम) , प्रभाष जोशी और नामवर सिंह चन्द्रशेखर जी के यहाँ लंच पर थे । अचानक लगभग इसी प्रकार के सन्दर्भ की पृष्ठभूमि में चन्द्रशेखर जी बोले "लोकेश , तुम जानते हो कि ये आलोचक कौन होता है ?" आलोचक हरम का वह हिंजड़ा होता है जिसे पता होता है कि हरम में क्या हो रहा है , उसका भी मन वह सब करने के लिये ठाठे मारता है लेकिन वह जानता है कि वो कर नहीं सकता ।"


मैं अपनी यह टीप विनोद भाई का शुकराना अदा करते हुए इस प्रश्न पर ख़त्म करता हूँ कि क्या कविता के हरम को इन हिंजड़ों से कभी मुक्ति मिल सकेगी ??


क्या कहते हैं ???


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)