इक मुखौटा आज फिर हमने लगाया
और फिर से पा लिया इक और चेहरा
आँसुओं को कौन देखेगा यहाँ पर
है किसे फ़ुर्सत जो मन के घाव देखे
सब हैं रिश्तेदार हँसते क़हक़हों के
बस तबस्सुम के सभी ने चाव देखे
क्यों भला संसार को रोकर दिखायें
है जो मन में कष्ट का संत्रास गहरा
हँस रहे हैं इसलिये जीवित हैं अब तक
रो रहे होते तो कब के बीत जाते
हार जाते वे जो हमको चाहते हैं
दुश्मनों के वार सारे जीत जाते
सत्य ने सदियों से कितने झूठ ढोये
आदि से अपना यही इतिहास ठहरा
दर्द के इस बाग़ में दर्पण दिखा कर
शूल बन कर हम यूँ ही धँसते रहेंगे
एक भी अवसर न देंगे हम जगत को
हो हँसी नकली मगर हँसते रहेंगे
मन में चाहे जिस तरह की बाढ़ आये
हमने पलकों पर लगा रक्खा है पहरा
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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