जाने कैसी सज़ा दे गया
उम्र भर का गिला दे गया
मुझसे माज़ी मेरा छीनकर
याद का सिलसिला दे गया
बुझ चुके थे जो कब के कोई
फिर से उनको हवा दे गया
इक तबस्सुम खड़ा द्वार पर
कौन मेरा पता दे गया
उसने मेरी ग़ज़ल क्या सुनी
इक नया क़ाफ़िया दे गया
ख़ुश रहूँ खिलखिलाता रहूँ
तू भी तो बद्दुआ दे गया
जानती है हर इक मौज ही
कौन 'साहिल' को क्या दे गया
लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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