संतों की भूमि पर वैचारिक प्रदूषण
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
भारत संतों की भूमि है। यहां जन्म लेने वालों की मानसिकता विचित्र है। इस पर पूरी दुनिया को आश्चर्य है। यहां के हिंदू धर्म परिवर्तन करने के बाद भी हिंदू ही बने रहते हैं। हिंदुओं की मानसिकता का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते हुए यहां ईसाई धर्मावलंबियों के साथ ही अंग्रेजी परस्त लोगों ने हिंदुओं की जीवनशैली बदलने के भरसक प्रयास किए और एक हद तक सफल रहे। अब ईसाई धर्म प्रचारकों ने अपने धर्म के साथ वेद शब्द भी जोड़ दिया है और अंग्रेजी नहीं जानने वाले पिछड़े हुए हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने के उद्देश्य से वे बाइबल की शिक्षाओं का प्रचार सत्यवेद के नाम से कर रहे हैं। वेद शब्द हिंदुओं की रग-रग में बसा हुआ है और उनकी आस्था धर्म परिवर्तन के बाद भी वैसी ही रहती है, जैसी धर्म परिवर्तन से पहले थी। वे हिंदू देवी-देवता की तस्वीर की जगह ईसा मसीह, मदर मैरी या किसी मजार की तस्वीर की पूजा करने लगते हैं। गीता, रामायण, हिंदू कथाएं छोड़कर बाइबिल, कुरान आदि से संबंधित साहित्य पढ़ने लगते हैं। इस पूरे धतकरम में धर्म बहुत पीछे छूट जाता है।
भारत के लोगों ने अपनी बुद्धि का सबसे ज्यादा उपयोग जीने की कला सीखने में किया। वे विज्ञान और तकनीक से दूर रहे, लेकिन शरीर और बुद्धि का बेहतर प्रयोग कैसे किया जा सकता है, इसके तरीके उन्होंने पर्याप्त रूप से विकसित किए। योग, ध्यान, तंत्र-मंत्र, जप-तप आदि भारत में ही विकसित हुए हैं। इससे आगे बढ़कर संगीत और साहित्य में भी भारत की तुलना नहीं हो सकती। संगीत की धारा इस देश में कब से प्रवाहमान है, कोई नहीं जानता। सात स्वर, उनके आयाम, ताल आदि के आधार पर गीत-संगीत की रचना भारत में ही संभव हो सकी है। यहां जानवरों की आवाजों जैसा संगीत रचने का प्रयास कभी नहीं हुआ। पुरुष के पौरुष और स्त्री के स्त्रीत्व को निखारने की कलाएं भारत में ही विकसित हुई हैं। इतनी गायन शैलियां, इतनी नृत्य शैलियां, गजलें आदि भारत के अलावा विश्व के और किस हिस्से में देखी जा सकती हैं? इसका विकास मनुष्य की लगन से हुआ है। कोई भी महान रचना व्यापार के उद्देश्य से नहीं रची जा सकती। हिंदुओं के जीवन में व्यापार का स्थान काफी पीछे रहा है, जिसका खामियाजा आज हिंदू भुगत रहे हैं।
अमेरिकी लेखक एल्विन टॉफ्लर ने 1950-60 में तहलका मचाने वाली तीन किताबें लिखी थीं, थर्ड वेव, फ्यूटर शॉक और पॉवर शिफ्ट। इन किताबों में उन्होंने तकनीकी क्रांति की वजह से भविष्य की बदलने वाली तस्वीर दिखाने का प्रयास किया था। उन्होंने लिखा था, संगीत, खेल और मनोरंजन जैसे साधनों का व्यापारीकरण हो जाएगा, संगठन खत्म होंगे, भीड़ बढ़ेगी, कई लोग एकसाथ एक ही परिसर में रहेंगे, लेकिन उनका एक-दूसरे से संपर्क नहीं रहेगा। उन्होंने और भी बहुत सी खतरनाक बातें लिखी थीं। उनकी किताब फ्यूटर शॉक की विश्व में 60 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकी थीं। जैसा उन्होंने लिखा था, वैसा हम आज होता हुआ देख सकते हैं।
पहले दुनिया बाहुबल प्रधान थी। मोहल्ले का दादा मोहल्ले का नेता होता था। उसके बाद आर्थिक ताकतों का वर्चस्व बढ़ा। बड़े कारोबारी, धंधेबाज शासन को प्रभावित करने लगे। अगला चरण बुद्धिबल प्रधान रहेगा। अपराधों में भी हम इस सिलसिले का क्रमिक विकास देख सकते हैं। घोटालों का बढ़ना अपराधों में बुद्धिबल का प्रयोग होने का प्रतीक है। समझा जा सकता है कि स्वार्थ के कारण बुद्धि का दुरुपयोग करने के मामले भी बढ़ रहे हैं। यह पूरा सिलसिला अंग्रेजों ने इस देश में शुरू किया है। भारत की दशा बिगाड़ने के लिए अंग्रेजों की तरफ से लॉर्ड थॉमस बैबिंग्टन मैकाले ने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग किया था। वह 1834 तक से 1838 तक भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर और लॉ कमीशन का प्रमुख रहा था।
मैकाले ने दो फरवरी 1835 में ब्रिटिश संसद में भाषण दिया था, जिसके एक अंश का हिंदी अनुवाद इस तरह है – “मैं भारत में काफी घूमा हूं। दाएं-बाएं, इधर-उधर मैंने यह देश छान मारा और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखा, जो भिखारी हो, जो चोर हो। इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी भी इस देश को जीत पाएंगे, जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को तोड़ नहीं देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और मैं इसलिए यह प्रस्ताव रखता हूं कि हम इसकी पुरानी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें, क्योंकि अगर भारतीय सोचने लग गए कि जो भी विदेशी और अंग्रेजी है, वह अच्छा है और उनकी निजी चीजों से बेहतर हैं, तो वे अपने आत्म गौरव, आत्म सम्मान और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे, जैसा हम चाहते हैं। एक पूर्ण रूप से गुलाम भारत।“
मैकाले ने यह भाषण 1835 में लंदन में दिया था। उसके 181 साल बाद आज की इस स्थिति में हम देख सकते हैं कि ज्यादातर हिंदू किस कदर मानसिक गुलामी की स्थिति में पहुंचे हुए हैं। जिन हिंदुओं को अंग्रेजों ने गुलाम बनाया था, वे देश आजाद होने के बाद भी गुलामी की दशा में है। हर चीज को व्यापार से जोड़ने से जो परिस्थिति बन गई है, उसने भारतीयों का पूरा जीवन बदल दिया है। परिवार है, घर चलाना है और उसके लिए जो पैसे की जरूरत बन गई है, उसके कारण अधिकांश साधारण लोग किसी न किसी के लिए मनमानी शर्तों पर काम कर रहे हैं। क्या यह गुलामी की दशा नहीं है? जब सरकार की नीतियां भी जनता की जेब से पैसे निकालकर अपना खजाना भरने की हो जाए तो जो हो सकता है, वह हो रहा है।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


0 टिप्पणियाँ