हिंदुत्व का आधार कण-कण में भगवान
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
भारत में जब भी लोगों की धार्मिक आस्था के साथ छेड़छाड़ हुई है, शासन करने वालों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। यहां के लोगों का जीवन धर्म के आधार पर चलता है। इस देश के लोगों की मान्यता रही है कि कण-कण में भगवान समाए हुए हैं। हर परमाणु ईश्वर का अंश है। जब भी यहां धर्म परिवर्तन या लोगों की धार्मिक आस्था को बदलने के प्रयास हुए, उसका तीखा प्रतिकार हुआ है। और यह काम इस देश में बहुत हुआ है। सम्राट अशोक ने सनातन धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया, देश में विरोध शुरू हो गया। शंकराचार्य ने बौद्धों की धार्मिक रीति-नीति का विरोध करते हुए सनातन धर्म के मूल्यों की स्थापना की और बौद्ध धर्म भारत से बाहर चला गया।
आज विश्व में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या बहुत है, जबकि भारत में बौद्ध अल्पसंख्यक हो गए हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायी सबसे ज्यादा चीन, जापान, हांगकांग, कोरिया, ताइवान, मकाउ, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर, श्रीलंका, मलेशिया, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, तिमोर, फिलीपींस, तिब्बत, भूटान, हिमालय क्षेत्र, मंगोलिया, रूस आदि देशों में पाए जाते हैं। 2010 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक उस समय विश्व की जनसंख्या के 32 फीसदी (2.2 अरब) ईसाई, 23 फीसदी (1.6 अरब) मुस्लिम, 15 फीसदी (एक अरब) हिंदू, सात फीसदी (करीब 50 करोड़) बौद्ध, 0.2 फीसदी (1.4 करोड़) यहूदी धर्म के अनुयायी थे। इसके अलावा अफ्रीका, चीन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के कई पारंपरिक पंथ-धर्म मानने वालों की संख्या 40 करोड़ से ज्यादा थी।
यह एक प्रमाण है कि भारत में सनातन धर्म से अलग किसी अन्य धर्म को मान्य नहीं किया जाता है और सनातन धर्म की मान्यताओं के खिलाफ नीतियां बनाने वाले शासक यहां ठीक से शासन नहीं कर सकते। सनातन धर्म या हिंदू धर्म अपने आप में बहुआयामी है। यह कई तरह के फूलों के गुलदस्ते की तरह, एक बगीचे के समान है। यहां सभी धर्मों को शरण मिलती है, लेकिन जब भी राजनीतिक कारणों से धर्म परिवर्तन के या कट्टरता फैलाने के प्रयास होते हैं, उसका तीखा विरोध भी होता है। अंग्रेजों ने यहां के लोगों की भाषा बदल दी, उनके जीने के तौर-तरीके बदल दिए। धर्म परिवर्तन करने के लिए ईसाई मिशनरियों को भी खूब बढ़ावा दिया, लेकिन वे बड़े पैमाने पर हिंदुओं की आस्था को नहीं बदल पाए। हिंदुओं की धार्मिक आस्था स्वतंत्र होती है।
इस सिलसिले में जिद्दु कृष्णमूर्ति का उल्लेख आवश्यक है। थियोसोफिकल सोसायटी ने जिद्दु कृष्णमूर्ति को विश्वगुरु घोषित करने के लिए प्रशिक्षित किया था। उनका जन्म तमिलनाडु में 12 मई 1895 को अपने माता-पिता की आठवीं संतान के रूप में हुआ था। कृष्ण भी वसुदेव और देवकी की आठवीं संतान थे, इसलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। कृष्णमूर्ति के पिता थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़े हुए थे। थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना रूस की हैलेना पैत्रोवना ब्लैवेतस्की और अमेरिका के कर्नल हेनरी स्टील आल्कार ने 17 नवंबर 1875 में की थी। विश्व में एक नए धार्मिक पंथ की स्थापना इस सोसायटी का उद्देश्य था। नए पंथ की स्थापना के लिए भारत सबसे अनुकूल स्थान होने से 1879 में इस सोसायटी का मुख्यालय मुंबई में स्थापित किया गया। 1882 में इसका प्रधान कार्यालय अद्यार (चेन्नै) स्थानांतरित कर दिया गया। 1895 में इसका मुख्यालय वाराणसी ले जाया गया। शुरू में थियोसोफिकल सोसायटी ने आर्य समाज के साथ मिलकर अपनी गतिविधियां शुरू की। बाद में वह स्वतंत्र रूप से आध्यात्मिक गतिविधियां चलाने लगी।
फिलहाल थियोसोफिकल सोसायटी की अद्यार स्थित शाखा के पास 266 एकड़ जमीन, कई भवन और कार्यालय हैं। यहां का पुस्तकालय विश्व के सर्वोच्च स्तर के पुस्तकालयों में शामिल है, जिसमें 12 हजार तालपत्र की पांडुलिपियां, छह हजार अन्य प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां और 60 हजार से ज्यादा पुस्तकें हैं, जो पाश्चात्य एवं भारतीय धर्म, दर्शन और विज्ञान से संबंधित हैं। इस सोसायटी की मान्यता थी कि विश्व में एक नए धर्मगुरु का अवतरण होने वाला है। एक बार 1909 में सोसायटी के वरिष्ठ पदाधिकारी चार्ल्स वेब्स्टर लीडबीटर मद्रास के अड्यार तट पर टहल रहे थे। तब उन्होंने अपने में गुमसुम एक 13 वर्षीय दुबले-पतले बालक को देखा, जो कि जिद्दु कृष्णमूर्ति थे। उन्होंने कृष्णमूर्ति को माता-पिता की अनुमति से अपने संरक्षण में ले लिया। थियोसोफिकल सोसायटी की तत्कालीन प्रमुख एनी बेसेंट ने कृष्णमूर्ति को शिक्षा-दीक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया। जब वह 1921 में लौटे तो एनी बेसेंट ने उन्हें विश्व गुरु घोषित करने का प्रयास किया।
कृष्णमूर्ति ने अपने पहले ही संबोधन में घोषणा कर दी कि वे न तो कोई विश्व गुरु हैं और न ही उनका कोई अनुयायी है। उन्होंने 1929 में ऑर्डर ऑफ द ईस्ट का खिताब वापस करते हुए थियोसोफिकल सोसायटी से अपना संबंध तोड़ लिया। उनका मानना था कि गुरु एक सत्ता होती है और किसी भी प्रकार की सत्ता का अनुयायी कभी भी अपने चेतन-अचेतन को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं समझ सकता। उन्होंने विश्व के सभी संगठित धर्मों के खिलाफ अपने विचार व्यक्त करने शुरू किए। उन्होंने कहा, किसी भी धर्म, दर्शन, विचार या संप्रदाय के मार्ग पर चलकर सत्य को हासिल नहीं किया जा सकता। वह मानते थे कि सत्य एक मार्ग रहित भूमि है और सत्य की खोज के लिए मनुष्य का सभी बंधनों से मुक्त होना जरूरी है। उनका कहना था कि लोग एक धर्म त्यागकर दूसरा अपना लेते हैं, एक राजनीतिक पार्टी छोड़कर दूसरी पकड़ लेते हैं, यह सतत बदलाव उस अवस्था को दर्शाता है, जिसमें बुद्धिमत्ता नहीं है।
आज भारत में कृष्णमूर्ति के विचारों का बहुत सम्मान है और वह भी एक संत की श्रेणी में माने जाते हैं। कृष्ण ने जो उपदेश गीता में दिए थे, कृष्णमूर्ति के विचारों में भी उसकी झलक देखी जा सकती है। इस उदाहरण से भारत में सनातन धर्म या हिंदुत्व का महत्व समझा जा सकता है। तमिलनाडु में जन्मे कृष्णमूर्ति ने इंग्लैंड में पूरे ऐशो आराम के साथ धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद घोषणा की कि वह खुद को विश्व गुरु नहीं मान सकते। गीता में भी कृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति परमात्मा को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति के प्रति आस्था रखता है, वह धर्म से भ्रष्ट हो जाता है। कृष्णमूर्ति विश्वगुरु घोषित कर दिए गए थे और वह अपनी अलग धार्मिक सत्ता कायम कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यही हिंदुत्व है।

0 टिप्पणियाँ