हिंदुओं की आस्था


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

संगीत, साहित्य और कला हिंदुत्व के आधार हैं। सनातन धर्म से जुड़ी तमाम कथाएं रची जाती रही हैं और देश के हर कोने में आरती, स्तुति, पूजा के माध्यम से संगीत गूंजता रहता है। यह परंपरा हिंदी फिल्मों के विकास से भी बहुत पहले की है। इस देश में धार्मिक और सामाजिक आधार पर कई गीत, भजन और नृत्य रचे गए हैं। संगीत सुनकर मंत्रमुग्ध होने वाले लोग भारत के अलावा और किसी देश में नहीं पाए जाते हैं। यहां तो राज दरबारों में भी संगीत और नृत्य की परंपरा रही है। कांग्रेस की सरकार ने इस परंपरा को धर्म से अलग हटकर जारी रखने की कोशिश की, जिससे शास्त्रीय कला का काफी विकास हुआ है, लेकिन इसे कभी भी हिंदुत्व से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन सबका आविष्कार ही हिंदुओं ने किया है।

मनुष्य अपने शरीर से, अपनी बुद्धि से जो कुछ कर सकता है, वह सब करने की योग्यता भारत में विदेशी शासकों के आने से पहले ही विकसित हो चुकी थी। सिर्फ तकनीकी विकास ही ऐसा था, जो भारत में नहीं हो पाया। भारत में मोटर नहीं बनी, पेट्रोल, डीजल, गैस जैसे ईंधन नहीं बने, इसलिए तकनीकी विकास की दौड़ में भी भारत पिछड़ गया, लेकिन पाश्चात्य यंत्रों का अपने हिसाब से उपयोग करने में हिंदू अपनी बुद्धि का चमत्कारी उपयोग कर लेते हैं। वे मोटर साइकिल के इंजन को पानी की मोटर से जोड़कर कुएं में से पानी निकाल लेते हैं। वाशिंग मशीन का उपयोग लस्सी बनाने में कर लेते हैं। पेट्रोल में घासलेट मिलाकर काम चला लेते हैं।

भारत में बुद्धि का विकास इस सीमा तक हुआ है कि जितनी कलाकारी और ठगी के तरीके भारतीयों के दिमाग से विकसित हुए हैं, विदेशी लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। जीविकोपार्जन के लिए अर्थ की उपयोगिता के कारण भारतीयों ने पैसे कमाने के लिए ऐसे-ऐसे तरीके विकसित कर लिए हैं कि जिनसे कई जगह मनुष्यों का जीवन तक खतरे में पड़ जाता है। चालाकी, चतुराई, चापलूसी हर जगह दिख जाती है। कई लोग दूसरों से अपना काम निकलवाने के लिए इन गुणों का उपयोग करते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोग इस धतकरम में लग गए हैं, जिससे हिंदुत्व और उससे जुड़ी धार्मिक भावना बहुत पीछे छूटी हुई प्रतीत होती है। कई लोगों का जीवन पाखंड से भरा हुआ मालूम पड़ता है। वे कहीं भी पत्थर गाड़कर उस पर पानी डालने लगते हैं और उसे शिवलिंग कहते हैं। पत्थर पर सिंदूर पोतकर उसके चारों तरफ एक घेरा बना देने से वह मंदिर हो जाता है, वहां पूजा-पाठ शुरू हो जाता है।

जो हिंदू लोग खुद को धार्मिक बताते हैं, उनका सोने-जागने, रहने का हिसाब-किताब आर्थिक आवश्यकताओं से प्रेरित होता है। शादी हो जाती है, रहने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती। एक-एक कमरे में कई-कई लोगों के परिवार रहते हुए देखे जा सकते हैं। वे सभी हिंदू हैं और अपनी पूरी धार्मिक आस्था के साथ हैं। रोज सुबह काम शुरू करने से पहले स्नान करके किसी तस्वीर पर अगरबत्ती लगा देते हैं, कुछ लोग अगरबत्ती लगाने के साथ कोई चालीसा, श्लोक, स्तोत्र, गीता के अध्याय, किसी धर्मग्रंथ के अंश का पाठ भी कर लेते हैं। इतने मात्र से धर्म का पालन पूरा हो जाता है। उसके बाद धंधा शुरू होता है। धर्म के नाम पर भारत में इतनी लंबी-चौड़ी अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है कि यहां कोई भी अर्थव्यवस्था कभी भी शून्य पर नहीं पहुंच सकती है। इतने पर्व, त्योहार और रीति-रिवाज स्थापित हो गए हैं कि उनमें समाज के जिम्मेदार लोगों को अनिवार्य रूप से कुछ-न-कुछ खर्च करना ही पड़ता है।

आजकल सारे मंदिर, मठ और धार्मिक संगठन श्रद्धालुओं के चढ़ावे से चल रहे हैं और उनके पास इतनी संपदा सदियों से इकट्ठा हो रही है, जिसका कोई हिसाब नहीं लगा सकता। इतिहास साक्षी है कि सोमनाथ मंदिर को लूटने के लिए मेहमूद गजनवी ने 17 बार हमला किया था। लूट वहीं होती है, जहां भौतिक संपदा होती है। देश में धर्म गुरुओं के तमाम आश्रम राजमहलों से कम नहीं है। जनता को त्याग का उपदेश देने वाले साधु-संतों का धन-संपदा और संपत्ति के प्रति इतना आकर्षण आश्चर्यजनक है। हम मान सकते हैं कि हिंदुत्व के नाम पर भोले-भाले धर्म प्रेमियों को ठगने का धंधा भी इस देश में बहुत चलता है। क्या करने से विपत्तियां दूर होती हैं, हिंदुत्व के नाम पर इसका विधिवत प्रचार किया जाता है।

इस विकट सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक वातावरण में हिंदू बुरी तरह उलझे हुए हैं और जन साधारण को उलझाए रखना ही राजनीति है। भारतवासी हिंदू सदियों से इस उलझन में फंसे हुए हैं। क्या धर्म है, क्या अधर्म? क्या उचित है, क्या अनुचित? हिंदू लोग अक्सर यही सोचते रहते हैं कि ईश्वर किस तरह प्रसन्न होंगे, जिससे उनकी तकलीफें दूर हों। ऐसे में हिंदुत्व के नाम पर सिर्फ गिने-चुने लोगों का राजनीतिक समर्थन करने से तकलीफें कैसे दूर हो सकती हैं? प्रश्न विचारणीय है। 

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)