हिंदुत्व के नाम पर ठहरी हुई राजनीति
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
पिछले दो सौ सालों में दुनिया बहुत बदल गई है। भारत के पास आध्यात्मिक ज्ञान है, जिसे कोई छीन नहीं सकता। आज भी बड़ी संख्या में लोग मंत्रों का जाप कर-करके जिंदगी काट रहे हैं। साधारण लोग जैसे-तैसे जीविकोपार्जन करते हैं और किसी भी तरह की विपत्ति की आशंका में भगवान को याद करते हैं। हिंदुओं के भगवान तस्वीरों और प्रतिमाओं में बसे हुए हैं। आर्य समाज सहित कई अन्य संप्रदाय निराकार परमात्मा की पूजा करते हैं, लेकिन उनका आधार भी कोई न कोई चित्र है। भले ही उस धर्म को प्रचलन में लाने वाले गुरुओं की तस्वीर या अक्षर ही क्यों न हो। हिंदुओं के कई देवी-देवता हैं। महादेव शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, हनुमान, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, गणेश आदि की बड़े पैमाने पर पूजा होती है। इनके तरह-तरह के चित्र हिंदुओं के घरों में देखे जा सकते हैं। कई त्योहार विभिन्न देवी-देवताओं के प्रति समर्पित है। देवी-देवताओं के स्तोत्र हैं, सहस्रनाम हैं, चालीसाएं हैं, श्लोक हैं, जिनका स्मरण करते हुए लोग समझते हैं कि वे परमात्मा को याद कर रहे हैं।
जब तक मुसलमान नहीं आए थे, तब तक भारतीय जीवन शैली अलग थी। सिले हुए कपड़े नहीं पहने जाते थे। मुसलमानों के आने के बाद दर्जियों को रोजगार मिला। कपड़ों की बुनाई और सिलाई का सिलसिला शुरू हुआ। चूड़ीदार पायजामे, पायजामे, कुर्ते, अंगरखे जैसे वस्त्र प्रचलन में आने लगे। भवन निर्माण शैलियों में काफी परिवर्तन हुआ। मुगलकाल में ताजमहल का निर्माण सर्वोत्तम वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। सत्ता और जनता के बीच संपर्क बनाए रखने में प्रचार तंत्र की अपनी भूमिका हमेशा से रही है। सत्ताएं अपनी विचारधारा जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार तंत्र का उपयोग करती रही हैं। बाद में जनता की बात सत्ता तक पहुंचाने के लिए पत्रकारिता का आविष्कार हुआ।
मुगल काल में कलात्मक शिलालेख, सजावट के सामान, रंगीन सरमरमर, रंग-रोगन, प्लास्टर, टाइल्स आदि का इस्तेमाल शुरू हुआ। इतिहास की किताबों के अनुसार दिल्ली में कुतुबमीनार का निर्माण ईसवी सन 1192 में हुआ था। यह मीनार अफगानिस्तान के मोहम्मद गोरी के सिपहसालार कुतुबुद्दीन एबक ने स्थानीय राजपूत राजा को हराने के बाद बनवाई थी। भारतीय वास्तुकला में सीधे क्रम में निर्माण होते थे। मुसलमानों ने धनुषाकार या मेहराबदार प्रवेश द्वार और गुंबद बनवाने शुरू किए। भारत में पाषाण कालीन कारीगरी पहले से थी। मुसलमानों की नई वास्तु शैली जुड़ने से भारतीय स्थापत्य को नए आयाम मिले। इसके बाद अंग्रेजों की सरकार बनने के बाद भारतीयों की जीवन शैली में और भी कई बदलाव हुए। अंग्रेजों का शासन चले जाने के बाद भारत में जो लोकतंत्र स्थापित हुआ, वह धर्म निरपेक्षता की विचारधारा पर आधारित था।
यह देश जैसा भी है, यहां रहने वाले लोगों की मेहनत से बना है। आज जो भी ऐतिहासिक स्मारक दिखाई देते हैं, उनके निर्माण में भारतीयों का ही खून-पसीना लगा है। राजनीति कैसी भी हो, लोग जीविकोपार्जन से जुड़े अपने नियमित कार्य आस्था और विश्वास के साथ करते हैं। विज्ञान का छात्र भी परीक्षा देने जाता है तो भगवान से प्रार्थना करने के बाद जाता है। आस्था किसी में भी हो सकती है, राम, कृष्ण, हनुमान, गणेश, देवी आदि। यही हिंदुत्व है। हिंदुओं की जीवन शैली के देखते हुए यहां कई मनोवैज्ञानिक प्रयोग किए गए हैं। अंग्रेजों ने हिंदुओं के धर्म को असंगठित और जातिवाद, वर्णभेद के शिकंजे में जकड़ा हुआ देखकर आबादी का वर्गीकरण करते हुए उनमें फूट डाली और शासन किया। इसके साथ ही शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था के माध्यम से भारतीयों के धार्मिक विश्वास को नकारने का प्रयास हुआ।
अंग्रेजों के जाने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीयों के मनोविज्ञान को समझते हुए खुद को एक सक्षम प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया और अपनी एक छवि बनाई। उन्होंने गांधी के साथ अपनी तस्वीरें बड़े पैमाने पर हर जगह लगवाई। हर कांग्रेसी के घर गांधी और नेहरू की तस्वीरें अनिवार्य रूप से लगने लगीं। कांग्रेस ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए तस्वीरों का जमकर इस्तेमाल किया। कांग्रेस के एकछत्र नेता नेहरू हुए, बाद में उनके परिवार की सत्ता स्थापित हो गई। अब उनके वंश में कोई भी ऐसा नहीं बचा है, जो इस देश की राजनीति को ढंग से संभाल सके, इसलिए जनता ने कांग्रेस को कोने में समेट दिया है।
कांग्रेस पर हिंदुत्व की उपेक्षा करने का आरोप सही है। उसकी वोट बैंक आधारित राजनीति अब फेल हो चुकी है। समाजवादी विचारधारा से जुड़ी अन्य पार्टियां भी किसी न किसी नेता विशेष के भरोसे चल रही है। किसी भी पार्टी की कार्यप्रणाली सिर्फ दिखावे के लिए लोकतंत्र पर आधारित है, लेकिन उसके पीछे व्यक्ति विशेष की भूमिका ही ज्यादा दिखती है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति इस समय हिंदुत्व के नाम पर ठहरी हुई है और सरकार की तरफ से सारे बौद्धिक प्रयास लोगों को राजनीतिक विमर्श से दूर रखने के लिए हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है। इस समय जब आर्थिक ताकतें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर काबू करने में लगी हुई हैं, तब आगे क्या होगा कोई नहीं जानता। क्या हिंदुओं का जीवन सिर्फ भगवान पर आस्था के आधार पर वैसा ही चलता रहेगा, जैसा पिछले सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है? क्रांतिकारी बदलाव जरूरी है।
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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