भाषा और देवनागरी लिपि
ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।
हिंदुत्व के संदर्भ में देश का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास किस दिशा में हो रहा है और देश किधर जा रहा है, इस पर विचार करना जरूरी है। मनुष्य की समस्त विचार प्रक्रिया पर पाश्चात्य विचारधारा बुरी तरह हावी है। अंग्रेज सरकार ने इस दिशा में आगे बढ़ने का मजबूत रास्ता पहले ही बना दिया था, जिसके कारण भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान को शिक्षा प्रणाली में कोई जगह नहीं मिली। इसी तरह आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का भी पाश्चात्य विचारधारा में कोई महत्व नहीं बचा है। यह हकीकत सबको समझनी पड़ेगी कि जब अंग्रेज भारत में नहीं आए थे, तब भी यहां लोग रहते थे। शासन प्रणालियां थीं। सामाजिक जीवन था। ज्ञान की धारा प्रवाहमान थी। महाभारत, रामचरितमानस जैसे ग्रंथ इसी देश में रचे गए हैं। इस देश में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू होने से काफी पहले उनकी रचना हो चुकी थी। जब चाणक्य ने भारत का राजनीतिक एकीकरण किया, तब भी अंग्रेजों का नामोनिशान नहीं था।
मुसलमानों के आने के बाद यहां जो संस्कृति बनी, उसमें सामाजिक जीवन में बहुत बदलाव आया। मुसलमान अपनी भाषा लेकर आए। अरबी और फारसी की जगह भारत में बनी। भारत में विभिन्न प्रांतों में कई भाषाएं चलती हैं। उनके शब्दों का समावेश करते हुए उर्दू का विकास हुआ। इसके साथ ही देवनागरी में लिखी जाने वाली खड़ी बोली की भाषा हिंदी बनी। उर्दू और हिंदी में कई तरह की समानताएं हैं। हिंदी का व्याकरण वेद निर्देशित है। उसमें संस्कृत और स्थानीय भारतीय भाषाओं के शब्दों की प्रधानता है, जबकि उर्दू में अरबी-फारसी के शब्दों का बाहुल्य है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। बाद में उर्दू को भी देवनागरी लिपि में लिखने का चलन बना।
भाषा पहले सिर्फ स्वरबद्ध होती थी। भाषा को लिपि में लिखने की परंपरा भारत में शुरू हुई और देवनागरी लिपि बनी। इसके शब्द दाएं से बाएं तरफ लिखे जाते हैं। इसमें अक्षरों को मिलाकर ऊपर एक रेखा से मिलाने पर शब्द बनते हैं। भाषा को लिपियों में लिखना सुमेरियन, बेबीलोनियन और यूनानी लोगों ने भारत से सीखा। संस्कृत, पाली, हिंदी, मराठी, कोंकणी, सिंधी, कश्मीरी, डोगरी, खस, नेपाली, तामांग, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, भोजपुरी, नागपुरी, मैथिली, संथाली, राजस्थानी आदि भाषाएं देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।
देवनागरी का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ, जो कि ध्वनि पर आधारित थी। अन्य भारतीय भाषाएं भी देवनागरी से मिलती-जुलती हैं। यह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है। इस तरह उच्चारण आधारित सर्वाधिक उपयुक्त भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी ही है। इतिहासकारों के मुताबिक सातवीं शताब्दी के बाद से कई राजाओं के शिलालेखों, सिक्कों में देवनागरी लिपि का उपयोग मिलता है। मेहमूद गजनवी ने जो चांदी के सिक्के चलाए थे, उन पर देवनागरी लिपि में संस्कृत लिखा है। कई मुस्लिम शासकों ने जो सिक्के चलाए, उन पर देवनागरी लिपि ही देखी जाती है। अकबर के सिक्कों पर देवनागरी में राम सिया लिखा गया था।
बताया जाता है कि ब्राह्मी लिपि 10 हजार साल पुरानी है। यह लिपि उससे भी पुरानी हो सकती है। सम्राट अशोक ने ब्राह्मी लिपि को धम्मलिपि नाम दिया था। यह देवनागरी से भी पुरानी लिपि है। संस्कृत भाषा भी ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती थी। ब्राह्मी लिपि भावचित्रात्मक होती थी। देवनागरी अक्षरात्मक लिपि है, लेकिन वह मूल रूप से ध्वनि पर आधारित है। देवनागरी की वर्णमाला में 12 स्वर और 34 व्यंजन हैं। तालू से बोलने वाले अक्षर कखगघ, जीभ और तालू से बोलने वाले अक्षर चछजझ, तथदधन, होठों से बोले जाने वाले अक्षर पफबभम, अन्य अक्षर यरलवशषसह आदि। यह हिंदुओं की भाषा है। लिपि का अर्थ है लीपना या पोतना। विचारों को लीपना ही लिपि कहलाता है। फिलहाल यह लीपने का काम बहुत हो रहा है।
आजकल इस देश में जितने लोग भी राजनीति कर रहे हैं, वे विचारों के आधार पर ही राजनीति कर रहे हैं और सभी हिंदू ही हैं। एक-दो को छोड़ दें तो सभी पार्टियों के समस्त नेता हिंदू ही हैं। धर्म के आधार पर कुछ मुस्लिम या ईसाई हो सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक विचारधारा तो हिंदुओं पर आधारित ही है। इस देश को अंग्रेजों ने एक स्वरूप दिया है और हिंदुओं ने अपनी विश्वबंधुत्व की विचारधारा के आधार पर उसे अपनाया है। भारत से अंग्रेज सरकार ने अपना कारोबार समेट लिया है। अब भारतीयों पर ही जिम्मेदारी है कि इस देश को किस स्थिति में रखना है।
स्कूल-कॉलेज ऐसे ही चलेंगे, जैसे चल रहे हैं। उनके पाठ्यक्रमों में बदलाव हो सकता है। आर्थिक विकास की धारा भी विश्व की परिस्थितियों के आधार पर अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से ही तय होगी। वैज्ञानिक विकास भी प्राचीन ज्ञान का सिर्फ ढोल बजाते रहने से होने वाला नहीं है। तकनीकी ज्ञान कहां से कहां पहुंच गया है। इन तमाम परिस्थितियों में तरह-तरह के प्रयोग हर दिशा में, हर क्षेत्र में हो रहे हैं। और यह सत्य है कि कोई भी प्रयोग मनुष्य पर ही केंद्रित होता है। बड़े स्तर पर कारोबार के विकास के लिए या सत्ता बनाए रखने के लिए समाज के साथ प्रयोग किए जाते हैं।
क्या हिंदू प्रयोग किए जाने के लिए हैं कि कोई भी आएगा और उन्हें भेड़ों के समूह की तरह हांक लेगा? कम से कम डेढ़ हजार साल से तो यही दिख रहा है। यहां यूनानियों ने शासन कर लिया, मुसलमानों ने कर लिया, पुर्तगालियों ने कर लिया, फ्रांसीसियों ने कर लिया, अंग्रेजों ने कर लिया, अंग्रेजों के जाने के बाद कांग्रेस ने एक अस्थायी धर्म निरपेक्षता की विचारधारा के आधार पर शासन कर लिया। अब इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में कुछ लोग प्रयोग कर रहे हैं। क्या इस तरह भारत विश्व शक्ति बने देशों की कतार में आ जाएगा? क्या सिर्फ एक पार्टी को जिता देने से यह हो सकता है? जब तक इस देश के हिंदुओं को अपनी प्रतिभा और योग्यता के अनुसार काम करने के मौके नहीं मिलेंगे, तब तक क्या भारत की प्रगति हो सकती है?
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)


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