हिंदुत्व और धर्म पर विचार-विमर्श


ऋषिकेश राजोरिया की कलम से।

हम सब हिंदू हैं और हिंदुत्व का पालन किए जाने की उम्मीद हमसे की जाती है। हिंदुत्व के साथ छद्म शब्द को जोड़ना ठीक नहीं है। हिंदुत्व भारतीयों के निजी संस्कार से संबंधित है। हिंदू लोग हिंदुत्व के आधार पर जीवन गुजारते हैं। भले ही वे कहीं भी रहते हों। जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, तब वह वहां रह रहे हिंदुओं के साथ हो रहे अन्याय का ही प्रतिकार कर रहे थे।

हिंदुओं का अपना स्वाभिमान होता है। पिछले कुछ वर्षों से इसका घोर राजनीतिकरण शुरू हो गया, जो कि कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप था। इस तरह पूरी ताकत से सत्ता के लिए हिंदुत्व को हथियार बना लिया गया। अगर कोई वास्तविक हिंदू है, तो वह खुले दिमाग का होगा, किसी भी राजनीतिक, धार्मिक या सांप्रदायिक खांचे में फिट नहीं बैठेगा। उसके अपने विचार होते हैं। इसके बावजूद सभी हिंदुओं को सिर्फ कुछ लोगों की सत्ता को चलाए रखने के लिए सिर्फ एक पार्टी के पक्ष में मतदात करने के लिए विवश करने में क्या तुक है? 

भारत में धर्म पर विचार-विमर्श आदिकाल से अब तक सतत जारी है, इसलिए भारत का सनातन धर्म एक जीवंत धर्म है, जिसे हम हिंदुत्व कहते हैं। भारत के लोगों में वैसी राजनीतिक चेतना कभी नहीं रही, जैसी पश्चिमी देशों के लोगों में पाई जाती है। यहां के लोग धार्मिक विषयों पर विचार ज्यादा करते हैं। राजनीति में उनका मन नहीं लगता। कई बार वे धार्मिक उन्माद से प्रभावित होकर राजनीतिक हानि-लाभ भूल जाते हैं। दुनिया में जितने भी धर्म हैं, उनमें धार्मिक उन्माद पैदा करने वाले तत्व हैं। सिर्फ हिंदुत्व या सनातन धर्म ही ऐसा है, जिसमें उन्माद पैदा करने वाले तत्व नहीं है। यही कारण है कि इसकी कई शाखाएं बनी हैं और लगातार बनती चली जा रही हैं। यहां मनुष्य और परमात्मा के संबंधों की जांच-पड़ताल का काम कभी स्थगित नहीं रहा। यह भारत की तासीर है। क्या इस तासीर को बदलते हुए हिंदुत्व को धार्मिक उन्माद पैदा करने का साधन बनाया जा रहा है? 

हर धर्म का एक लिखित धर्मग्रंथ होता है, जो किसी धर्म गुरु की ओर से प्रवर्तित होता है। हिंदू धर्म वैदिक सिद्धांतों पर आधारित है और वैदिक सिद्धांतों की व्याख्या अब तक जारी है। इस देश में जितने भी साधु, संत या धर्मगुरु हुए हैं, सभी ने वैदिक सिद्धांतों की अपने तरीके से व्याख्या अवश्य की है। हिंदुओं में व्याप्त जातिवाद के खिलाफ जितने भी धार्मिक संगठन बने हैं, वे अपनी विचारधारा का प्रचार करने के लिए वेदों का सहारा लेते हैं। भारत में पैदा हुआ कोई भी धर्म ऐसा नहीं है, जिसने वेदों का आश्रय नहीं लिया हो। जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, कबीर पंथ हो या आर्य समाज, सिख पंथ हो या दादूपंथी, सभी वैदिक सिद्धांतों की डोर थामे हुए हैं।

धार्मिक संगठन बनाने की कोई नियमावली इस देश में नहीं है। यहां घोर आस्तिक और अंधविश्वासी की बातें भी सुनी जाती हैं और घोर नास्तिक की भी। धर्म में परंपरागत लीक से हटकर अपना रास्ता बनाने वाले संत सिर्फ और सिर्फ भारत में ही पाए जाते हैं। यहां सभी धर्मों की बातें सुनने की परंपरा है। यह देश यूरोप की तरह नहीं है, जहां इस सत्य का उद्घाटन करने पर गैलिलियों की आंखें फोड़ दी गई थी कि सूर्य धरती के आसपास नहीं, बल्कि धरती सूर्य के आसपास घूमती है। सभी के विचारों को महत्व देने की परंपरा के तहत भारत में धार्मिक संगठनों की भी बहुतायत है। साईं बाबा का नाम सभी हिंदू जानते हैं, जिनका उल्लेख किसी पौराणिक ग्रंथ में नहीं है। साईं बाबा कौन थे, कहां से आए थे, कैसे भगवान का दर्जा पा गए, कोई नहीं जानता। हालांकि कुछ स्थानों पर उनकी जन्मतिथि 15 अक्टूबर 1918 बताई जाती है। द्वारका और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने बताया था कि साईं एक मुसलमान थे, उनका नाम चांद मियां था, उनका जन्म 1838 में हुआ था और 1908 में उनका देहांत हो गया था। वे साईं की भक्ति हिंदू धर्म को बिगाड़ने का प्रयास मानते हैं।

हिंदू धर्म में शंकराचार्य की मान्यता है, लेकिन कोई अगर साईं बाबा की पूजा करने लग जाए तो उसे हिंदू धर्म से बाहर नहीं निकाला जा सकता। आदि शंकराचार्य की जो भूमिका ईसवी पूर्व पांचवीं सदी में थी, उसके बाद से शंकराचार्य की परंपरा कायम है। शंकराचार्य ने चार पीठ स्थापित की थी। जोशीमठ में ज्योतिर्मठ, पुरी में गोवर्धन मठ, दक्षिण भारत के शृंगेरी में शृंगेरी शारदा मठ और पश्चिमी भारत में द्वारका में द्वारका पीठ। इसके अलावा शंकराचार्य नाम से और भी कई पीठें बन गई हैं। फिलहाल देश में करीब दो दर्जन से ज्यादा शंकराचार्य बताए जाते हैं। कौन असली शंकराचार्य है और कौन नकली, यह विवाद साधुओं के बीच कुंभ में भी उठा था।

शंकराचार्य ने दशनामी साधु संप्रदाय की स्थापना की थी। इन संप्रदायों में गिरी, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम शामिल हैं। इन दस संप्रदायों के साधुओं को 10 भागों में बांटा गया। जो पहाड़ों में विचरते थे, वे गिरी कहलाए। कुछ साधु वनवासी हुए। सरस्वती के तट पर धर्म प्रचार करने वाले साधु सरस्वती कहलाए। जो जगन्नाथपुरी के आसपास के क्षेत्र में प्रचार करते थे, उनका नाम पुरी हो गया। समुद्रतटों और तीर्थ स्थलों पर रहने वाले साधु तीर्थ कहलाने लगे। उपरोक्त चार मठों के अलावा तमिलनाडु में कांची मठ भी शंकराचार्य की ओर से स्थापित माना जाता है।

जो शैव पंथ के आचार्य होते हैं, उन्हें शंकराचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर आदि की उपाधि दी जाती है। वैष्णव पंथ के आचार्यों को रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य, महंत आदि की पदवी मिलती है। नागा साधु दोनों संप्रदायों में होते हैं। साधुओं के मूल रूप से चार संप्रदाय हैं, शैव, वैष्णव, उदासीन और शाक्त। इनके कुल 13 अखाड़े हैं। इन्हीं के अंतर्गत साधु-संतों की शिक्षा-दीक्षा होती है। इनके अलावा स्वघोषित, स्वयंभू धर्माचार्यों की भी कमी नहीं है। इनमें से कुछ लोगों ने हिंदुत्व के हित में काम किया जिनमें महर्षि महेश योगी, प्रभुपाद जैसे संत शामिल हैं। जबकि कुछ ढोंगी भी हैं, जैसे आसाराम, गुरमीत राम रहीम, निर्मल बाबा आदि।

सनातन धर्म में से ही निकला एक संगठन प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय है, जिसने धर्म के नए मानदंडों की स्थापना की है। इसकी स्थापना दादा लेखराज ने की थी, जो भारत विभाजन से पहले हीरों के व्यापारी थे। 1937 में उन्होंने सिंध स्थित हैदराबाद में इस संगठन की नींव रखी थी। इस संस्था में आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग की शिक्षा दी जाती है। संगठन के प्रमुख होने के नाते लेखराज को प्रजापिता ब्रह्मा नाम दिया गया। शुरू में इस संस्था में महिलाएं ही थीं, जो ब्रह्माकुमारी कहलाती थीं। बाद में इसमें पुरुषों का भी प्रवेश हुआ और वे ब्रह्माकुमार कहलाने लगे। फिलहाल 137 देशों में इस संस्था की 8500 से अधिक शाखाएं हैं। इन शाखाओं से करीब दस लाख विद्यार्थी जुड़े बताए जाते हैं। इसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय राजस्थान के आबू में है। इस संगठन की विचारधारा सहभागिता, आम सहमति, सम्मान, समानता और नम्रता पर आधारित है।

इस तरह और भी कई साधु-संतों का हिंदुओं के जीवन पर गहरा प्रभाव है। कई जातियों के अलग-अलग गुरु हैं। पंजाब, हरियाणा में साधु-संतों के कई डेरे हैं, जो अलग-अलग साधु संभालते हैं। अलग-अलग जातियों के हिंदुओं की अलग-अलग धार्मिक व्यवस्था है। इसके बावजूद ये सभी हिंदू ही कहलाते हैं। इस परिस्थिति में हम समझ सकते हैं कि मनु स्मृति के नाम पर हिंदुओं का जो सामाजिक ढांचा बनाया गया था, वह तहस-नहस हो चुका है। आजकल बाजारों में उपलब्ध जिस मनु स्मृति पर लोग भरोसा करते हैं, वह भी असली है या नहीं, कोई नहीं जानता। मनुष्यों के बीच भेदभाव पैदा करने वाला जो जाति आधारित हिंदू समाज बना है, उसमें कई दोष हैं। यही कारण है हिंदू धर्म में सुधार के अभियान निरंतर चलते रहते हैं और कई ढोंगी-पाखंडी भी धर्म का बाना पहनकर इस बहती हुई गंगा में हाथ धोकर प्रतिष्ठा और धन अर्जित करते रहते हैं। जब उनकी पोल खुलती है, तो हिंदू ही उन्हें निबटा भी देते हैं। यही हिंदुत्व है।

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)