केशव शर्मा की नजर से।
सैकड़ों श्मशान में पड़ी अस्थियां अचानक रात को रो पड़ी। नाम पते की पर्चियों के साथ पड़ी हजारों गठरियों ने मिलकर गंगा मैया को पुकारा कि हे गंगा मैया! कब तक हमें यहां इस ढेर के बीच में पड़े रखोगे। अब तो अपने सानिध्य में बुला लो जिससे कि हमारा उद्धार हो जाए। 1 दिन पुकारा 2 दिन पुकारा, 3 दिन पुकारा। गंगा मैया ने उनकी सुनी नहीं। और जब अस्थियों के ढेर बढ़ते गये, गठरियों की संख्या बढ़ती गई तो इन सब की पुकार बहुत तेज हो गई। सब ने मिलकर एक दिन जोर से रात को पुकारा, हे गंगा मैया। कब बुला रही हो हमें? आखिरकार कई दिनों से खामोश बैठी गंगा मैया भी बोली----- अरे अस्थियों! मुझे मालूम है सैकड़ों वर्षो से तुम मेरे आगोश में समाती रही हो। मैंने कभी मेरी पवित्रता को लेकर उन पर संदेह नहीं किया। हजारों टन, लाखो टन, हर साल तुम मेरे में समाती हो। मैंने कभी कोई प्रतिरोध नहीं किया। बिना कोई जाति पाति, ऊंच-नीच, अमीर- गरीब और मालिक मजदूर! किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना मैंने जो भी मेरी शरण मे आया उसकी अस्थियों को अपने आगोश में ले लिया। लेकिन सालों साल से मुझे अस्थियों की गंगा बनाते हुए तुमने कभी ये नहीं सोचा कि तुम्हारा ही ये अमानवीय लालच और लोभ के साथ काली कमाई के लिए बढ़ती जा रही लालसा एक दिन तुम्हारा ऐसा विनाश करेगी कि मुझे तुम्हारी हस्तियों की जगह तुम्हारे पूरे शरीर को ढोहना पड़ेगा। देख लो, अब! समय बदल गया है। तुम तो फिर भी खाक में होकर गुजरी हो। मैं तो इन दिनों लाशों को ढो रही हूं। बिना जली, जीती जागती तो क्या कहूं----- समूचे शरीर सहित हजारों अनगिनत लाशों का बोझ इन दिनों मेरे भीतर समाया हुआ है। इसलिए तुम रोजाना चीख-पुकार मत करो। चुपचाप जहां हो वहीं पड़ी रहो। मैं देखती हूं कि कब तक मुझ पर पड़ा ये लाशों का बोझ कम होता है। जिस दिन मुझे इन लाशों से मुक्ति मिलेगी, उस दिन मैं तुम्हारी शुद्धि के लिए तैयार रहूंगी। तब तक हे! अस्थियों तुम जहां हो वहीं रहो।


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