प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की आवाज़ में। 



प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की कलम से। 

2014 के लोकसभा के चुनाव के प्रचार में नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता और उनकी नौकरशाहों पर पकड़ को बहुत प्रचारित किया गया।  2014 से 2019 तक के उनके पहले प्रधान मंत्रित्व काल में भी इक्का दुक्का केंद्रीय मंत्रियों को छोड़कर सभी पीएम मोदी की छाया मात्र ही प्रतीत हुए और देश के मीडिया ने बजाय इसे कमी बताने के इसे मोदी की विशिष्ठ कार्य शैली का दर्जा देकर मोदी का महिमा मंडन यह कहकर किया था कि ऐसे ही गुजरात सिरमौर बना था और अब ऐसे ही भारत विश्व गुरु बनेगा। 



2019 के एक तरफा बहुमत आने के बाद केंद्र सरकार में दो कार्यवाहक हैं - मोदी और और शाह और बाकी सभी कारिंदे हैं।  हाँ कारिंदों की दो किस्म है - सरकारी बाबू और चुनी हुई कठपुतलियां।



इससे पहले कि कुछ और कहूँ यह बात समझ लीजिये कि यह जो भी बात हो रही है वो देश में कोविड की प्रचंड लहर के साए में हो रही है। 

हाँ तो अब चूँकि कठपुतलियां तो वही करती हैं जो बाजीगर करवाता है सो उनकी चर्चा करना बेमानी है।  सिर्फ मेरा ही नहीं देश के एक बड़े वर्ग का मानना है कि आज़ादी के बाद पहली बार इतने रबर स्टाम्प कुरता पायजामा पहन कर केंद्र में मंत्री कहलाये। बर्दाश्त इसलिए था क्योंकि मोदी की नेतृत्व क्षमता पर अटूट यकीन था।  

यकीन इसलिए था कि पीएम अपनी नौकरशाहों की फ़ौज से देश को सही तरीके से नेतृत्व दे देंगे बाकी केंद्रीय मंत्री रुपी बाउंडरी वॉल के किनारे लगे पेड़ दिखने में अच्छे लगते हैं और पीएम को भव्यता प्रदान करते हैं। मंत्रियों ने सौंपा गया अपना काम बखूबी किया - जब भी बोले, 'हिज मास्टर्स वॉइस' बनकर बोले, 10 में से 10 नंबर।   



तो सवाल है नौकरशाहों ने क्या किया ? क्या जब मंत्री ही सजावटी पेड़ बने हुए थे तो क्या किसी केंद्र में बैठे आईएएस की रीढ़ इतनी सीधी थी कि वो सच्ची और दो टूक ज़मीनी हक़ीक़त पीएम मोदी या गृह मंत्री अमित शाह से कह सकता ? आपको जान कर आश्चर्य होगा कि हाँ ऐसे कुछ अफसर थे और हैं जिन्हौने अपना फर्ज बखूबी ना सही लेकिन रस्मी तौर पर निभाया जरूर। 

और यह बात प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए कोविड मैनेजमेंट में ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है।  

अब मैं आपको भारत में कोरोना मैनेजमेंट की अब तक की पूरी कहानी तारीख सहित बताऊंगा।  अंत में आप खुद तय कीजियेगा  खता किसकी है ? और सजा किसने पाई ? और हाँ इससे पहले आप मुझे खोजी पत्रकार मानने की गलती करें मैं बता दूँ कि जो कुछ मैं आगे बताऊंगा वो देश के मीडिया ने आपसे छुपाया है लेकिन यहसभी जानकारी रायटर्स जैसी प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी को हमारे ही देश के उच्च पदस्थ लोगों ने 'ऑन द रेकॉर्ड' दी है।  

बात शुरू करते हैं कोरोना की पहली लहर से जब ताली - थाली बज चुकी थी, दिए जल चुके थे और देश अचानक लगे लॉक डाउन की विभीषिका से हुई श्रमिकों की मौत का कड़वा घूँट भी 'देश के लिए क़ुर्बानी' के नाम पर पी चुका था।  



तो साहेबान कोविड की पहली लहर के बाद INSACOG यानि इंडियन सार्स-कोव-2 जेनेटिक्स कंसोर्टियम का गठन किया गया जो सीधा प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट करता है। इसी संस्था ने हाल ही में रायटर्स समाचार एजेंसी को बताया कि उन्हौने कब और कौन सी जानकारी केंद्र में किस किस से साझा की थी। 

सरकारी संस्था इंस्टिट्यूट ऑफ़ लाइफ साइंसेज के निदेशक और INSACOG के सदस्य अजय परीदा ने रायटर्स को बताया कि INSACOG के शोधकर्ताओं ने फरवरी 2021 में ही कोविड के उस भारतीय म्युटेंट को खोज लिया था जिसे अब दुनिया B.1.617 के नाम से जानती है। और उससे बड़ी बात INSACOG ने यह अति महत्वपूर्ण जानकारी केंद्र के स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कण्ट्रोल (NCDC) के साथ 10 मार्च 2021 को साझा भी कर दी थी।

इतना ही नहीं INSACOG ने अपना फर्ज निभाते हुए मीडिया को रलीज होने वाले व्यक्तव्य के ड्राफ्ट में लिखा -

“There is data of E484Q mutant viruses escaping highly neutralising antibodies in cultures, and there is data that L452R mutation was responsible for both increased transmissibility and immune escape."

मोटे तौर पर हिंदी में आप इसे ऐसे समझ सकते हैं " इस बात का डाटा उपलब्ध है कि E484Q म्युटेंट वायरस उच्च क्षमता वाले एंटीबायोटिक से भी बेअसर है और इस बात के भी साक्ष्य हैं कि म्युटेंट L452R पहले से तीव्र हस्तांतरण और प्रतिरक्षा को भेदने में सक्षम है। "

 साधारण शब्दों में यह समझ लीजिये कि देश के वैज्ञानिकों ने सरकार को बताया कि देश में मौजूद वायरस म्युटेंट ज्यादा आसानी से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसकी प्रतिरोधक क्षमता को भेद सकने में सक्षम है। 

 INSACOG द्वारा तैयार किया गया यह मीडिया व्यक्तव्य का ड्राफ्ट केंद्रीय कैबिनेट सचिव राजीव गौबा को भेज दिया गया जो कि सीधे प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट करते हैं।  अब कैबिनेट सचिव क्या ऐसी जानकारी पीएम से छुपा कर सिर्फ अपने तक ही सीमित रख सकते हैं या नहीं और उन्हौने यह जानकारी पीएम को दी अथवा नहीं यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन बात का कुल अर्थ यह है कि हमारे देश के वैज्ञानिकों ने केंद्र सरकार को मार्च 2021 के पहले पखवाड़े में ही देश में फ़ैल रहे कोविड के खतरनाक म्युटेंट के बारे में आगाह कर दिया था।  

इसके लगभग दो हफ्ते बाद 24 मार्च को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने INSACOG द्वारा दी गई जानकारी सार्वजनिक कर दी बस उसमें से ' गहरी चिंता ' जैसे शब्द हटा दिए गए और जोर ज्यादा टेस्टिंग और क्वारंटाइन करने पर दिया गया।  कुल मिलाकर केंद्र सरकार ने नए घातक म्युटेंट को फ़ैलाने से रोकने के लिए कोई कदम उठाना तो दूर की बात बल्कि अपना असम, केरल, पुडुचेरी और बंगाल का चुनावी अभियान जारी रखा और इस बीच देश में 1 अप्रैल तक कोरोना संक्रमण एक महीने पहले की तुलना में चार गुना फैल चुका था। 

आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि नेशनल टास्क फ़ोर्स के चीफ और प्रधानमंत्री मोदी के कोरोना पर टॉप सलाहकार वीके पॉल ने भी 15 अप्रैल को ही देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन की सिफारिश कर दी थी।  यह बात NCDC के निदेशक सुजीत कुमार सिंह ने 18 अप्रैल की एक बैठक में ऑन रिकॉर्ड कही थी कि हमने यह बात बिलकुल स्पष्ट शब्दों में केंद्र सरकार को बता दी थी कि अगर अभी एकदम सख्त कदम नहीं उठाए गए तो हम नए म्यूटेन्ट की वजह से तेजी से बढ़ने वाली मृत्यु दर को नहीं रोक पाएंगे।   

सुजीत कुमार सिंह ने 19 अप्रैल को कहा कि देश में लॉक डाउन अब से 15 दिन पहले लग जाना चाहिए था। 

अब सबसे रोचक और आँखें खोल देने वाली बात जो पढ़ी, देखी और सुनी तो पूरे देश ने थी पर यह बात प्रधानमंत्री मोदी ने NCDC के निदेशक की लॉक डाउन की सिफारिश के बावजूद राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में कही, यह किसी को पता नहीं थी। 

20 अप्रैल 2021 यानि सुजीत कुमार सिंह के 19 अप्रैल के व्यक्तव्य के सिर्फ एक दिन बाद देश के पीएम ने देश के नाम अपने सम्बोधन में कहा (जिसे आप सभी ने सुना और देखा था) - 

प्रधानमंत्री के इस राष्ट्र के नाम सम्बोधन का यू ट्यूब लिंक नीचे दे रहा हूँ।  पूरा सुनना चाहे तो पूरा सुने अन्यथा 16.26 से 16.45 सुन लीजिये।  

https://youtu.be/H1pJHCkdWPE

वैसे मोटे तौर पर मोदी जी ने अपने सम्बोधन में राज्यों को लॉक डाउन से बचने की सलाह दी थी।  

भारत से खतरनाक वायरस म्युटेंट कम से कम 17 देशों में तो पहुँच ही चुका है जिन्हौने हमारी उड़ानों पर पाबन्दी भी लगा दी है।  लेकिन सवाल यह है कि हम लाचार देशवासी किसी के भी कहीं भी आने जाने पर पाबन्दी नहीं लगा सकते कम से कम प्रधानमंत्री, गृह मंत्री , जल शक्ति मंत्री , राहुल गाँधी, जया बच्चन , मिथुन चक्रवर्ती जैसी अज़ीमों शान शख्शियतों पर तो कतई नहीं। हो सकता है राहुल गाँधी को म्युटेंट की भयावहता का अंदाजा ना हो क्योंकि वे सरकार में तो हैं नहीं और फिर उनको बेनीफिट ऑफ़ डाउट इसलिए भी दे देना चाहिए क्योंकि वे पहले देश के नेता थे जिन्हौने कोरोना की वजह से अपनी चुनावी रैली रद्द की थी।  लेकिन देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग, सबकुछ जानते बूझते आग से खेलते रहे, क्यों ? 

सत्ता हर हाल में , हर कीमत पर।  

तभी पूरे समय में मोदी जी के मुंह से यह कभी नहीं सुना कि मैंने देश में इतने कोरोना मरीज एक ही दिन में कभी नहीं देखे या सुने थे। हाँ उनको यह कहते पूरी दुनिया ने सुना था कि मैंने इतनी बड़ी संख्या में लोग किसी रैली में नहीं देखे।  

तो उसकी परिणीति है अब अर्थियोँ, ज़नाज़ों और कॉफिन्स की रेलम पेल है।  

चलिए देश दिल पर पत्थर रखकर अपने सबसे लोकप्रिय नेता से कहना चाहता है कि जो हो चुका सो हो चुका।  अब तो आम ही बोइये ताकि आम ही पैदा हों।  बबूल का दंश है देश के पास याद रखने को।