प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की आवाज़ में।
प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की कलम से।
कहतें हैं जो सोया हो उसे जगाया जा सकता है पर जो सोने का अभिनय कर रहा हो उसे कैसे जगायेंगे ? लेकिन हमारे देश के की स्थिति तो और भी विकट है। हमारे हुक्मरान तो सत्ता के मद में चूर किन्तु सजग होने का ना केवल अभिनय कर रहें हैं बल्कि पूरे देश को इसी बात की ताईद करने को भी कह रहें हैं कि सभी कहें कि इतना सजग नेतृत्व इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। कोढ़ में खाज - देश का मुख्य धारा का मीडिया - हिज मास्टर्स वॉइस। 2016 के आस पास से तो मुख्य धारा के मीडिया ने तो एक अनोखा काम शुरू कर दिया - सत्ता में बैठे लोगों से पूछे जाने वाले सवाल विपक्ष से पूछ कर अपनी खोजी पत्रकारिता का बखान करना। सत्ता पक्ष की आईटी आर्मी ने इस मीडिया के प्रमुख एंकरऔर कॉलम लिखने वालों को देशभक्त पत्रकारों का दर्जा देकर आम लोगों के बीच मान्यता भी दिलवा दी। बहरहाल बात हो रही है देश की दुर्दशा के यज्ञ में जिन जिन ने आहुति दी, उनकी। ऐसी ही आहुति देकर अपना वर्तमान जन्म सुधारने वालों में अफसरशाही भी रही। लेकिन अफसरशाही के लिए एक बात कहनी पड़ेगी और वो ये कि उन्हौने नया कुछ नहीं किया बस अपनी चाटुकारिता को नए आयाम दिएअन्यथा वे वही करते रहे जो वे सदा से करते हैं। हुक्मरानों की जी हुजूरी कर के अपना उल्लू सीधा करना। अब चूँकि हम लोकतंत्र होने का दावा करते हैं सो संवैधानिक संथाओं की भी चर्चा का ली जाए। देश की न्याय पालिका, चुनाव आयोग, नीति आयोग, आरबीआई जैसी संस्थाओं के कब कब जन हितैषी मामलों में सक्रीय भूमिका निभाई यह तो जनता ही याद करके बताए तो ज्यादा अच्छा और पारदर्शी होगा। विपक्ष की भी बात कर लेते हैं। 2014 की शर्मनाक हार से ज्यादा विपक्ष नोटबंदी से ज्यादा धाराशाई हुआ। प्रधानमंत्री मोदी के अथाह प्रचार तंत्र के दौर में भारत का विपक्ष घोषित कंगाल था सो मीडिया ने तो उसे गिनना ही छोड़ दिया। ऐसे में राहुल गाँधी, अखिलेश,यादव, ममता बनर्जी सरीखे नेताओं ने यदि देश हित की कोई बात आगे भी रखी तो उसे ट्विटर राजनीति कह कर माखौल ही बनाया गया।
यानि कुल मिलाकर ना खाता ना बही जो केंद्र सरकार ने कही, वही सही। अब आप केंद्र में बैठे सर्वशक्तिमान की मनःस्थिति का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि 2019 में दोबारा पहले से ज्यादा प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद हमारे नेता दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की सरकार बनाने में जुट गए। वहां गए और हाउडी मोदी हुआ और फिर यहाँ बुलाकर नमस्ते ट्रम्प कर डाला। बेशक इसके लिए अहमदाबाद के कालीन पर टाट के पैबंद लगाकर बुलबुलाते कोरोना को छुपाकर अपनी शतुर्मुर्गी अवस्था का ट्रेलर दिखा दिया। प्याज के भाव पर सरकार गिरा देने वाली जनता की ख़ामोशी ने शतुरमुर्ग को और बढ़ावा दिया। और फिर शुरू हुआ भारत के इतिहास का वो अध्याय जो अभी चल ही रहा है। कोरोना की दस्तक हुई, लॉक डाउन लगा, ताली बजी, थाली बजी , दीये जले , कोरोना पर जीत का जश्न मना , पूरे मंत्रीमंडल और भाजपा ने मोदी जी कुशल नेतृत्व में कोरोना की हार का सदक़ा उतारा और...... लग गए किसानों के आंदोलन को कांग्रेस का वित्त पोषित कार्यक्रम बताने में, पेट्रोल-डीज़ल- रसोई गैस के भावों की ऐतिहासिक ऊंचाई के मूक दर्शक बनने में। नेतृत्व की खुमारी देखिए कि कोरोना को मक्खी- मच्छर समझ कर लग आगे चुनावी रैलियां करने में। देश के पूर्व में असम में जलाए दीये को भी प्रज्जवलित रखना था और आमार सोनार बंगाल में पर भी कब्ज़ा करना था। यूपी में होने वाले पंचायत चुनावों पर नज़र रखते हुए कुंभ मेले को करवाना था और येन केन दक्षिण के राज्यों में भी कमल खिलाना था।
इतना कुछ अगर एजेंडे पर हो तो देश चलाना, अर्थव्यवस्था पटरी पर लाना, महंगाई कम करना आदि दिल्ली में सेंट्रल विस्टा बनाने के बाद 2024 से पहले कभी भी किया जा सकता था। कोई भी आदमी, सर्व शक्तिमान भी, सोचता कुछ है पर होता कुछ और ही है। आ गई कोरोना की दूसरी लहर. सोते (अभिनय) हुए जगाया उसने हमारी केंद्र सरकार को। केंद्र सरकार की कोरोना के प्रति सजगता के तीन उदाहरण काफी होंगे आपको पूरा परिदृश्य समझाने के लिए। पहला देश में कोरोना के टीके को विकसित करने में लगी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एसआइआइ ) को शुरूआती आर्थिक मदद देने से हमारी केंद्र सरकार ने मना कर दिया था और बाद में यह मदद मिली मेलिंडा और बिल गेट्स फाउंडेशन से। भारत सरकार ने तो एसआइआइ को अप्रैल 2021 में तब रुपये दिए जब उसने अंदर खाने टीका सप्लाई करने से हाथ खड़े कर दिए। दूसरा खुद केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत केंद्रीय समिति ने 2020 में ही कोरोना की दूसरी लहर के मद्दे नज़र ऑक्सीजन संकट की बात से आगाह किया था और तब मोदी सरकार ने देश भर में 133 ऑक्सीजन प्लांट लगाने की अनुशंसा की थी। बंगाल चुनाव में ध्यान ही नहीं हैं रहा कि सिर्फ 32 ही लग पाएं हैं। तीसरा और अंतिम उदाहरण - भारत ने अब तक लगभग 61 करोड़ वैक्सीन डोज निर्यात की हैं। इतने में पूरे मुंबई, दिल्ली और अन्य महानगर निपट जाते। अब जिस के जो मन में आया वही बोल दिया लेकिन हक़ीक़त यह है कि मोदी सरकार ने ये टीके निर्यात करके अपना वचन ही निभाया था कोई देश द्रोही कार्य नहीं किया था। अब भई जब ऑक्सफ़ोर्ड ने भारत में सस्ती वैक्सीन विकसित होने के लोभ में यहाँ टीका बनाने के लिए एसआइआइ से करार किया था तो साथ में उसके निर्यात का क्लॉज़ भी था। यह बात विदेश मंत्री एस जयशंकर खुद मान चुके हैं। यानि भारत में बना वैक्सीन जिसे आत्मनिर्भर भारत से जोड़ कर दिंखाया जा रहा था वह असल में इतना भी भारतीय नहीं था।
अब मोदी सरकार ने भारतीय मीडिया की बोलती बंद कर रखी है पर वैश्विक मीडिया की नहीं और वैश्विक मेडिकल जर्नल की तो कतई नहीं सो विश्व की सबसे प्रतिष्ठित लेंसेट मेडिकल जर्नल ने मोदी सरकार के बखिये उधेड़ दिए। लेसेन्ट ने लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी की ज्यादा रूचि ट्विटर पर से अपने आलोचना हटाने में थी ना कि देश से कोरोना हटाने में। पत्रिका आगे लिखती है कि अपनी आलोचना और खुली बहस को कोरोना महामारी के दौरान दबाना अक्षम्य है। इस पत्रिका ने 1 अगस्त तक भारत में 1 करोड़ मौतों की आशंका व्यक्त करते हुए लिखा है कि यदि ऐसा होता है तो यह मोदी सरकार द्वारा किया धरा ही होगा। लेंसेट ने कुम्भ मेले के आयोजन और भारी भीड़ आमंत्रित कर चुनावी रैलियों की भी जबरदस्त आलोचना की है। पत्रिका ने मार्च महीने के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के उस व्यतव्य को भी निशाने पर लिया है जिसमे बढ़ते कोरोना मामलों के बीच उन्हौने कोरोना के एंड गेम की घोषणा की थी। लेसेन्ट ने और भी बहुत कुछ कहा है लेकिन एक बात बहुत महत्वपूर्ण कही है कि अब सरकार को अपनी कोरोना के खिलाफ रणनीति फिर से बनानी चाहिए और इसके लिए जरुरी है कि वह सबसे पहले यह माने कि उससे पहले गलती हुई है।
अब सर्व शक्तिमान क्या कभी गलती कर सकते हैं ? इस सवाल का जवाब ही देश की लाखों ज़िन्दगियों की साँसों का भी फैसला करेगा।


1 टिप्पणियाँ
अंदरखाने , शब्द का भरपूर मज़ेदार उपयोग , सटीक
जवाब देंहटाएं