प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की आवाज़ में -
प्रधान संपादक प्रवीण दत्ता की कलम से।
दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ती हमारे देश में है , सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है , सबसे भव्य राम मंदिर भी जल्द बन जायेगा लेकिन जिस रफ़्तार से दाह संस्कार की अंतिम क्रिया मानने वाले मर रहें हैं....... इन समय जरुरत सबसे बड़े श्मशान की है। अब सवाल ये है श्मशान और कब्रिस्तान की बात करने वाले इस काम का बीड़ा उठाने को तैयार मालूम नहीं होते सो यह दुरूह किन्तु आवश्यक काम कौन करेगा ? क्या लाला रामदेव ? या जत्ती सद्गुरु जी ? या फिर विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल ? हाँ ये आखिर वाले ही उचित रहेंगे क्योंकि इनके पास हिन्दुओं के लिए धन की कमी तो हो नहीं सकती। अरबों रुपये का चंदा है राम जी के नाम का और हजारों बिना 'राम नाम सत्य है' के उद्घोष के श्मशान पहुँच भी गए और थोड़े इन्तजार के बाद उनका दाह संस्कार भी जैसे तैसे हो ही गया। विवाद की बात यहाँ नहीं करेंगे कि विधान के विपरीत सूर्यास्त के बाद हुआ या रात्रि के अँधेरे में। तथ्य यह है राम जी को मानने वाला राम जी की शरण में चला गया। अब इतने हजारों राम जी के पास गए हैं तो बनने वाले भव्य मंदिर में दो चार कक्ष कम बना लेना। मंदिर तो श्रद्धालुओं से होता है और श्री राम में श्रद्धा रखने वाले तो सीधे ही उन्हीं के पास भेजे जा रहें हैं तो मंदिर पहुँचने के बाय पास के बजट से ही श्मशान के लिए बजट निकाल लो। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने तो अंतिम संस्कार का खर्चा स्थानीय निकायों के जिम्मे डाल दिया है सो चंदा इकठ्ठा करने वाले संघठन इन लोगों से भी इनके नकाहे हुए पैसों में से सहयोग ले सकतें हैं।
बिना दवा, बिना वैक्सीन, बिना ऑक्सीजन वैसे भी लगभग सभी कोरोना मरीज मौत का इन्तजार करते हुए मरे हैं। ' मरने के बाद भी, मेरी आखें खुली रहीं। कि आदत पड़ी हुई थी, इंतज़ार की। अब मौत के बाद का इन्तजार हम सबसे बड़ा श्मशान बनाकर ख़त्म कर सकते हैं। फिर जैसे हमने अयोध्या के टूरिस्ट सर्किट को मार्केट करने का प्लान बनाया है वैसे ही सबसे बड़े श्मशान की भी मार्केटिंग की योजना बना सकते हैं। कल्पना कीजिये एक साथ सैकड़ों चिताएं अन्धकार में प्रज्वलित, रोजाना शाम को। सिर्फ एक शो, अब तक के हर लाइट एंड साउंड शो को मात करता हुआ। सबसे बड़े श्मशान में सबसे बड़ा दाह संस्कार। इस बारे में इस सरकार के इवेंट एक्सपर्ट ज्यादा बता पाएंगे लेकिन क्या इस शो को देखने वाले दर्शकों को उनके स्मार्टफोन पर अंतरिक्ष से ली हुई सैकड़ों जलती हुई चिताओं की सैटेलाइट तस्वीरें अगर वहीँ बैठे बैठे मिल जाएँ तो बस इवेंट में चार चाँद लग जाएँ। आप सोच भी नहीं सकते कि विदेशियों में इसका कितना आकर्षण होगा क्योंकि उनके के यहाँ अंतिन क्रिया की रस्में बहुत ही नीरस होती हैं। इसे कहतें हैं आपदा को अवसर बनाना। परीक्षा प्रश्न पात्र में आए सबसे मुश्किल सवाल को सबसे पहले हल करना। और फिर यह शो फ्री तो होगा नहीं। टिकट लगेगा। इन टिकटों की बिक्री से जमा हुई रकम से ऐसे और श्मशान बनाएंगे। अस्पताल बनाने में, दवाइयां इम्पोर्ट करने में, हैल्थ इक्विप्मेंट बाहर से लाने में और भी ऐसे अन्य कामों में समय लगता है। श्मशान बनाने में काहे का समय ? सो कसम राम की खाते हैं, सबसे बड़ा श्मशान जरूर बनाएंगे।


1 टिप्पणियाँ
करारे व्यंग्य
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