क्या जीने के ढंग मिले थे
क्या जीने के ढंग हो गये
विविध जीव हैं इस धरती पर
सभी प्रकृति से प्यार समेटे
केवल हम मानव ऐसे हैं
जो अपने कर्मों के हेटे
हम ही अपने लालच के वश
हर नफ़रत के संग हो गये
पहले हमने गढ़ा ईश्वर
अलग-अलग फिर धर्म बनाये
कभी ज़ात को कभी धर्म को
वैर-भाव के कर्म सिखाये
ऐसा हमने किया संकुचन
सारे मज़हब तंग हो गये
गाँधी का दर्शन कहता है
लालच और ज़रूरत समझो
पशुओं और परिन्दों से कुछ
कुदरत की यह संगत समझो
अब धरती में रंग भरो फिर
हम जिसमें बेरंग हो गये
अगर विविधता नहीं रही तो
कभी एकता नहीं रहेगी
एक रंग को एक धर्म को
धरती माँ तो नहीं सहेगी
औरों की कमियाँ रँगने में
हम सब केवल रंग हो गये
बहुत ख़राबी है दूजे में
लेकिन हम हैं पाक-साफ़ क्या
अपनी कमियाँ भी हम देखें
अपना उजला है लिहाफ़ क्या
राजनीति के हाथों में क्यूँ
हम बेताला चंग हो गये
मानव मानव सभी एक हैं
कोई छोटा बड़ा नहीं है
अलग स्वेद का अलग रक्त का
जग में कोई घड़ा नहीं है
फिर क्यों नफ़रत के माँझे से
हम ही कटी पतंग हो गये
जैव विविधता दिवस दिखाता
फिर से दर्पण हमें आज है
जीव-जन्तुओं के जीवन में
प्रकृति-प्रेम का रहा राज है
आरोही कुदरत के क्यूँ ये
अवरोही आहंग हो गये


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