देवताओं के घायल हैं सर देखिये

सिरफिरे पत्थरों का हुनर देखिये


मेरी गफ़लत को अख़बार करते हैं जो

अपने ऐबों से हैं बेख़बर देखिये


वो उड़ानें थीं मन की या कोई भरम

ये झुलसते हुए बालो-पर देखिये


नक़्शे-पा जब से धुँधले पड़े हैं मेरे

कितनी वीरान है रहगुज़र देखिये


चाँद को कोसना जुगनुओं का चलन

इनकी फ़ितरत का है ये असर देखिये


जितने सूरज अँधेरों के हामी रहे

सब के सब हो गये मोतबर देखिये


जिसके सुख-दुख में हरदम मैं शामिल रहा

"कैसी बदली है उसने नज़र देखिये


आपमें कितनी कमियाँ हैं 'साहिल' मियाँ

अपने अन्दर कभी झाँककर देखिये


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)