उतर सारी की सारी जा रही है 

कहाँ मेरी ख़ुमारी जा रही है 


नज़र नीची किये फिरते हैं भँवरे 

कली की शर्मसारी जा रही है


ठहाकों में हुए तब्दील आँसू  

शबे-फ़ुरक़त गुज़ारी जा रही है  


अजब मूरख हो सीरत देखते हो 

अभी सूरत निखारी जा रही है 


कहारों की जगह दिखती हैं ख़ुशियाँ 

दुखों की वो सवारी जा रही है  


बड़े छोटों से बच के चल रहे हैं  

पुरानी पासदारी जा रही है 


लगीं जिसकी ज़माने भर को नज़रें  

नज़र उसकी उतारी जा रही है 


मियाँ हम भी तो पीछे ही पड़े हैं 

ग़ज़ल की रेढ़ मारी जा रही है 


यहाँ हाथों में छाले हो रहे हैं

वहाँ क़िस्मत सँवारी जा रही है


बिगड़ मत देख बस चुपचाप 'साहिल'  

नदी किस-किस पे वारी जा रही है 


 


लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)